गधे के क्रिया-कर्म के बहाने

Updated at : 25 Jul 2016 1:09 AM (IST)
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गधे के क्रिया-कर्म के बहाने

एक कहावत है कि वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. इसी के मद्देनजर एक मालिक अपने गधे को बेटा कहता था. बेचारा गधा तो गधा ही ठहरा. उसको भरपेट खाना नहीं मिलता, लेकिन कई बार मौका मिलने पर भी वह नहीं भागा. उसे आशा थी कि एक-न-एक दिन उसके दिन सुधरेंगे. […]

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एक कहावत है कि वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. इसी के मद्देनजर एक मालिक अपने गधे को बेटा कहता था. बेचारा गधा तो गधा ही ठहरा. उसको भरपेट खाना नहीं मिलता, लेकिन कई बार मौका मिलने पर भी वह नहीं भागा. उसे आशा थी कि एक-न-एक दिन उसके दिन सुधरेंगे. उसने कई बार सुना था. मालिक अपनी बेटी चंपा को चेतावनी दे रहा था- अगर तू पढ़ने पर ध्यान नहीं देगी, तो तेरी शादी इसी गधे से कर दूंगा. इसी कारण उसने मालिक को कभी दुलत्ती नहीं मारी, आखिर उसका मालिक ससुर जो ठहरा.

एक दिन चंपा की बरात आयी. वह गधा पिछवाड़े बंधा ही रह गया. लेकिन उसे तब बहुत खुशी हुई, जब उसे पता चला कि मालिक के पास दहेज में नकदी कम पड़ गयी. चंपा को मजबूरन वरमाला गधे जैसे गुणों से भरपूर एक मानुष के गले में डालनी पड़ी.

मगर वह गधा ही क्या, जो इतनी जल्दी अपनी आशा छोड़ दे. उसे पूरी आशा थी कि मैन ऑफ द मैच वही होगा. उसे उम्मीद थी कि एक दिन चंपा अपने गधेनुमा पति से लड़-झगड़ कर वापस आयेगी और फिर चांद-सितारों सा आंगन होगा. वह अरसे तक सोचता रहा कि पता नहीं क्यों चंपा कभी वापस ही नहीं आयी.

गधा अब बूढ़ा हो चला था. वह किसी काम का नहीं रहा. मालिक ने उसे सड़क पर भटकने के लिए छोड़ दिया. जो मिले खाओ और प्रभु के गुण गाओ. यों यहां साल भर पार्टियां चलती हैं. इंसान खाता कम है और फेंकता ज्यादा है. चौपायों की नियति में किसी बेकाबू ट्रक या मोटर के नीचे आकर सद्गति प्राप्त करना होता है.

अब बेचारा वह बूढ़ा गधा सड़क पर आ गया. लेकिन जिंदगी के इस अंतिम पड़ाव पर भी उसने आशा नहीं छोड़ी. सूंघता हुआ वह किसी तरह अपने मालिक की बेटी चंपा की गली में जा पहुंचा कि कम-से-कम उसे देखते हुए दम तो निकलेगा. अभी वह यह बात सोच ही रहा था कि एक भारी ट्रक ने उसे पीछे से ठोंक दिया, और वह भी ठीक चंपा के घर के सामने. बेचारा गधा तत्काल परलोक पहुंच गया.

लेकिन पिक्चर अभी बाकी है!

चंपा एक अच्छी नागरिक है. कर्तव्य से बंधी महिला है. उसने नगर निगम के मुखिया को फोन मिलाया. बमुश्किल फोन उठा. चंपा ने सूचित किया कि उनके घर के सामने एक गधा परलोक सिधार गया है. निगम के मुखिया ने चिर-परिचित बेरुखी दिखायी- गधा मर गया तो मैं क्या करूं? निगम ने गधों के क्रिया-कर्म करने का ठेका नहीं ले रखा है मैंने. चूंकि आपके घर के सामने गधा मरा है, तो क्रिया-कर्म भी आप ही को करना होगा.

चंपा समझ गयी कि यह नाशुक्रा निगम का मुखिया इस तरह से नहीं मानेगा. उंगली टेढ़ी करके घुमानी होगी. पार्षद का चुनाव भी नजदीक है. लिहाजा चंपा ने फौरन पलटवार किया- गधे का क्रिया-कर्म तो मैं करूंगी ही. लेकिन यह भी जरूरी है कि गधे के नाते-रिश्तेदारों को भी खबर कर दूं. इसका सबसे नजदीकी रिश्तेदार नगर निगम है. और मुखिया होने के नाते मुखाग्नि आप ही देंगे. चैनल और प्रिंट मीडिया के लोग भी आ चुके हैं. बस अब आपका ही इंतजार है.

नतीजा यह हुआ कि दस मिनट के भीतर नगर निगम की मरे पशु ढोनेवाली लाॅरी आयी और उस दिवंगत गधे को ससम्मान उठा कर ले गयी. गधे की आत्मा को बड़ी ही शांति मिली. चारों तरफ चंपा के इस कृत्य की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई. अगले साल निगम चुनाव में उसकी पार्षदी पक्की समझो.

वीर विनोद छाबड़ा

व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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