दालों के आयात से दबी खेती

Updated at : 13 Jul 2016 6:14 AM (IST)
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दालों के आयात से दबी खेती

बिभाष कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ माननीय प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में मोजाम्बिक की यात्रा के दौरान वहां से दाल आयात करने के बाबत एक दीर्घावधिक करार किया है. समझौते के मुताबिक, 2016-17 के दौरान मोजाम्बिक से एक लाख टन दाल का आयात किया जायेगा और अगले चार साल में इसे दूना करने […]

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बिभाष
कृषि एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
माननीय प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में मोजाम्बिक की यात्रा के दौरान वहां से दाल आयात करने के बाबत एक दीर्घावधिक करार किया है. समझौते के मुताबिक, 2016-17 के दौरान मोजाम्बिक से एक लाख टन दाल का आयात किया जायेगा और अगले चार साल में इसे दूना करने का लक्ष्य तय किया गया है. भारत में दालों के उत्पादन और उपभोग में लगातार, साल-दर-साल अंतर बना हुआ है. भारत में एक बड़ी जनसंख्या शाकाहारी है, जिसके लिए दाल प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है.
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दाल उत्पादक और सबसे ज्यादा दाल का उपभोक्ता दोनों है. फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013 में पूरी दुनिया का 21.56 प्रतिशत दालों का उत्पादन भारत में हुआ. रूस 10.35 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है. भारत में दालों की खपत लगभग 22-23 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जबकि उत्पादन 17 से 19 मिलियन टन के बीच रहता है. वर्ष 2013-14 में दालों का उत्पादन 19.27 मिलियन टन था.
भारत जिन देशों से दालों का आयात करता है, उनमें प्रमुख हैं कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, बर्मा, मेक्सिको, तुर्की, ईरान आदि. नेपाल और सीरिया से भी भारत दालों का आयात करता रहा है.
अफ्रीकी देशों से भी दालों का आयात होता रहा है, जिसमें मोजाम्बिक भी शामिल है. वर्ष 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल भूमि 328.73 मिलियन हेक्टेयर में से 140.80 मिलियन हेक्टेयर में खेती होती है, जो कि कुल भूमि का लगभग 46 प्रतिशत बैठता है. हम दालों का सबसे ज्यादा आयात, वर्ष 2014-15 में 2.19 मिलियन टन, कनाडा से करते हैं. अब कनाडा को ही लें. कनाडा में कुल लगभग 45 मिलियन हेक्टेयर में ही खेती योग्य भूमि है. वर्ष 2014-15 में म्यांमार से 0.93 मिलियन टन दालों का आयात किया गया. म्यांमार में कुल लगभग दस लाख हेक्टेयर ही कृषि योग्य भूमि है. ऑस्ट्रेलिया से हमारा आयात 0.33 मिलियन टन था. वहां कुल 46 लाख हेक्टेयर भूमि ही खेती योग्य है.
अमेरिका में कुल खेती योग्य भूमि लगभग 150 मिलियन हेक्टेयर है. मोजाम्बिक में कुल 5.53 मिलियन हेक्टेयर भूमि खेती योग्य है. इस प्रकार हम देखेंगे कि भारत में वर्ष 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के कृषि योग्य भूमि से कुछ कम ही भूमि में खेती हुई.
अगर भारत की परती पड़ी हुई जमीन के आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 2011-12 में 25.38 मिलियन हेक्टेयर भूमि परती पड़ी हुई थी. इसमें 10.67 मिलियन हेक्टेयर भूमि एक से पांच सालों से परती पड़ी हुई थी और 14.72 हेक्टेयर एक साल से कम यानी चालू साल में परती पड़ी हुई थी. अब मोजाम्बिक से ही तुलना कर लीजिये कि हमारी कुल परती पड़ी जमीन के पांचवें हिस्से पर ही वहां खेती होती है और हम वहां से बड़ी मात्रा में दाल आयात करने जा रहे हैं.
अगर हम परती पड़ी भूमि के कारणों पर नजर डालें तो, चालू मौसम में किसान अपनी हैसियत, असमय बरसात आदि कई कारणों से जमीन पर खेती न करके परती छोड़ देते हैं. बहुत सी जमीनें ऐसी होती हैं, जो एक साल से पांच साल की अवधि तक परती पड़ी रहती हैं. लंबी अवधि के लिए जमीनों को परती छोड़ने के मुख्य कारण हैं, किसान के पास पूंजी का न होना, सिंचाई का समुचित प्रबंध न होना, मिट्टी का क्षरण, खेती का लाभकारी न होना आदि.
अगर हम अन्य आंकड़ों पर नजर डालें, तो दालों के उत्पादन, मार्केटिंग और लाभप्रदता को देखते हुए किसान दालों की खेती के लिए हाशिये पर पड़ी जमीन का ही उपयोग करते हैं. वर्ष 1997-98 में जहां दालों की खेती का 11.3 प्रतिशत रकबा ही सिंचित था, वर्ष 2011-12 में बढ़ कर मात्र 16.1 प्रतिशत तक जा सका. किसी भी जोखिम प्रबंध का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है कि किसी क्रिटिकल फैक्टर के विकास और नियंत्रण के लिए अनुकूल रणनीति अपनायी जाये.
दालों की उपज भारत में वर्ष 2013-14 में 764 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रिकॉर्ड की गयी थी. इस आधार पर हम देखें, तो सिर्फ चालू मौसम में परती पड़ी जमीन, 14.72 मिलियन हेक्टेयर, के उचित प्रबंध से हम अपने लिए मांग की भरपाई के लिए समुचित मात्रा में दाल पैदा कर सकते हैं. वर्ष 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार, कुल 24.46 मिलियन हेक्टेयर में दालों की खेती हुई थी. आंकड़ों के अनुसार, शुद्ध खेती की गयी जमीन का 46.34 प्रतिशत भूमि सिंचित है. अगर हम दालों की खेती के लिए सिंचाई की सुविधा भी बढ़ा दें, तो भी हम अपने लिए मांग के अनुसार दाल पैदा कर सकते हैं.
दालों का आयात करने का मतलब यह हो सकता है कि हम अपनी कृषि पर विश्वास नहीं कर रहे हैं. हमें दालों के उत्पादन, प्रोक्योरमेंट और वितरण प्रबंध को लेकर नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करना पड़ेगा.
दालों की खेती के लिए एकरेज बढ़ाने के लिए जहां विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों को अपने रिसर्च को गांवों में पहुंचाना पड़ेगा, जिससे उत्पादकता और कीट प्रोकोप की समस्या से मुकाबला किया जा सके, वहीं सरकारी एजेंसियों को भी दालों के लिए सिंचाई की सुविधा बढ़ाने का कार्यक्रम चलाना पड़ेगा. वर्तमान सरकार ने देश के विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों को निर्देश दे रखा है कि वे अपनी खोज किसानों तक समयबद्ध तरीके से पहुंचायें. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती होगी कि मौजूदा दाल के एकरेज को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराया जाये.
दूसरी चुनौती है कि चालू मौसम में पड़ी परती जमीन तत्काल प्रभाव से दालों की खेती के अंतर्गत लाया जाये. दालों को केंद्रीकृत राशन प्रणाली में शामिल कर सरकार चावल और गेहूं की तरह इनका भी प्रोक्योरमेंट (सरकारी खरीद) और वितरण करे. इससे किसानों के स्तर पर मार्केटिंग की समस्या का हल निकल सकेगा. दालों के प्रसंस्करण की क्षमता भी बहुत कम है. एमएसएमइ नीति में इसे उचित स्थान देना पड़ेगा.
और बैंकों को भी दालों के उत्पादन, भंडारण और प्रसंस्करण की पूरी शृंखला में पर्याप्त पूंजी का इंतजाम करना पड़ेगा.
कई देशों, जहां से हम दाल आयात कर रहे हैं, की कुल कृषि योग्य भूमि से ज्यादा अपने देश में जमीन परती रख कर दालों का आयात देश के कृषि की अनदेखी ही कही जायेगी.
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