लेकिन भीतर से मर रही है हिंदी

Updated at : 13 Jul 2016 6:11 AM (IST)
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लेकिन भीतर से मर रही है हिंदी

चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज ‘नेट की हिंदी समझने के लिए अंगरेजी आना जरूरी’- यह व्यंग्य में बोला गया वाक्य नहीं, बल्कि एक अखबार में छपी खबर का शीर्षक है. बीते रविवार को जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर पूरे देश में निर्धारित केंद्रों पर राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) हुई. इस परीक्षा का पहला प्रश्न-पत्र सभी उम्मीदवारों […]

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चंदन श्रीवास्तव

एसोसिएट फेलो, कॉमनकॉज

‘नेट की हिंदी समझने के लिए अंगरेजी आना जरूरी’- यह व्यंग्य में बोला गया वाक्य नहीं, बल्कि एक अखबार में छपी खबर का शीर्षक है. बीते रविवार को जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर पूरे देश में निर्धारित केंद्रों पर राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) हुई.

इस परीक्षा का पहला प्रश्न-पत्र सभी उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य होता है और खबर के मुताबिक इस अनिवार्य प्रश्न-पत्र के हिंदी-रूप में तकरीबन अबूझ शब्दों का प्रयोग हुआ, जैसे- क्षिप्त आवेग, प्रतिस्थिति विस्थापना, वाक् स्वराघात परिवर्तन. खबर का निष्कर्ष है कि ‘इस तरह की कठिन हिंदी को देख कर ज्यादातर परीक्षार्थी तो चकरा गये, क्योंकि यह ऐसी हिंदी है, जिसे समझने के लिए अंगरेजी आना जरूरी है.’

खबर के इस निष्कर्ष से शायद ही किसी को ऐतराज हो. ‘क्षिप्त आवेग’ शब्द की जगह अगर उसी प्रश्न-पत्र के अंगरेजी रूप में मौजूद शब्द ‘मेन्यूप्लेटेड इमोशंस’ अथवा ‘वाक् स्वराघात परिवर्तन’ के लिए ‘वॉयस मॉड्यूलेशन’ शब्द को देखें, तो पूछे गये सवाल के कुछ बेहतर समझ की संभावना बनती है. लेकिन क्या यह मूल प्रश्न-पत्र अंगरेजी में तैयार करने और फिर हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी के लिए उसका घटिया अनुवाद करने भर का मामला है, जैसा कि खबर में बताया गया है?

ऐसी एक खबर 2012 के दिसंबर में ‘यूजीसी की नेट परीक्षा में हुई हिंदी की दुर्दशा’ शीर्षक से छपी. लिखा था कि ‘मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म के प्रश्न-पत्र में ‘हेवी व्यूअर्स’ और ‘लाइट व्यूअर्स’ के लिए ‘भारी दर्शक’ और ‘प्रकाश दर्शक’ शब्द का प्रयोग किया गया था. सो परीक्षार्थियों को ‘हिंदी ट्रांस्लेशन को समझने में ना सिर्फ अतिरिक्त समय लगाना पड़ा, बल्कि कुछ सवालों को पढ़ कर चक्कर-सा आ गया.’

समाचार लिखनेवाले को भले लगे कि घटिया अनुवाद के कारण हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी के लिए प्रश्न-पत्र को समझना टेढ़ी खीर हो रहा है, लेकिन बात इससे कहीं ज्यादा गंभीर है.

‘हैवी व्यूअर्स’ और ‘लाइट व्यूअर्स’ के लिए ‘भारी दर्शक’ और ‘प्रकाश दर्शक’ शब्द का प्रयोग वही अनुवादक करेगा, जो जनसंचार की किताबों में टीवी देखने के प्रभाव के बारे बतानेवाले सिद्धांत ‘कल्टीवेशन थ्योरी’ से अनजान हो. इस सिद्धांत का प्रस्ताव है कि कोई व्यक्ति टेलीविजनी पर्दे पर चित्रित दुनिया को देखने में जितना ज्यादा वक्त गुजारता है, सामाजिक यथार्थ उसके लिए उतना ही टेलीविजनी होता जाता है.

यानी यह टीवी देख कर सामाजिक यथार्थ को परखने और टेलीविजनी कथाओं से प्रभावित-प्रेरित होकर सामाजिक भूमिकाओं को अपनाने का मामला है. इस सिद्धांत के प्रस्तावकों में से एक जाॅर्ज गर्नर ने एक सर्वेक्षण के आधार पर रोजाना 2 घंटे टीवी देखनेवालों को ‘लाइट व्यूअर्स’ कहा, दो से चार घंटे टीवी देखनेवाले को ‘मीडियम व्यूअर्स’ और रोजाना चार घंटे से ज्यादा टीवी देखनेवालों को ‘हैवी व्यूअर्स’ कहा.

हिंदी की असली दिक्कत यह नहीं कि उसके पास ‘हैवी व्यूअर्स’ और ‘लाइट व्यूअर्स’ जैसे पारिभाषिक शब्दों के समतुल्य कोई शब्द नहीं है, बल्कि यह मान लेना है कि वह एक तो ज्ञान की भाषा नहीं हो सकती और दूसरे, हिंदी-भाषी जगत के भीतर अगर किसी किस्म की ज्ञान-पिपासा है, तो फिर उसे बड़े हद तक अनुवाद के जरिये संतुष्ट किया जा सकता है.

औपनिवेशिक दबाव या फिर अपनी बरतर सांस्कृतिक स्थिति के कारण एक बार अगर आप किसी भाषा के बारे में मान लें कि वह ज्ञान-रचना की भाषा नहीं हो सकती, तो फिर अनुवाद-कर्म की प्रतिभा और परिश्रम को भी पाला मार जाता है. याद रहे, कभी इसी हिंदी भाषा में ‘द डिजर्टेड विलेज’ के लिए ‘ऊजड़ ग्राम’ और ‘द रिड्ल ऑफ द यूनिवर्स’ के लिए ‘विश्व-प्रपंच’ जैसे शब्द गढ़ने का साहस था. जिन्होंने ये शब्द रचे, वे हिंदी को ज्ञान-रचना की भाषा मानते थे.

लग सकता है कि हिंदी का काम अनुवाद के सहारे खूब चल रहा है. यह दावा भी किया जा सकता है कि भूमंडलीकरण के इस मीडियामय वक्त में हिंदी बढ़ रही है. लेकिन, यह भी सच है कि ऊपर बढ़ती हुई यह हिंदी भीतर से रोज मर रही है.

भाषा के होने और बढ़ने के लिए जितना जरूरी है उसका प्रसार, उतना ही जरूरी है प्रसार पाती भाषा के भीतर विचार का होना. मीडियामय वक्त में हिंदी सहित शेष भारतीय भाषाओं के प्रसार को बल मिला है, लेकिन उनमें विचार का स्वर मंद पड़ा है.

ज्यादातर भारतीय भाषाएं भूमंडलीकरण के दौर में तुरंत-फुरंत सूचना देने के दबाव में अनुवाद की भाषा बन कर रह गयी हैं. उनकी चिंता किसी अंगरेजी शब्द का हिंदी-तमिल-तेलुगु पर्याय गढ़ने की ज्यादा है, और उस मौलिक अवधारणा को गढ़ने की कम, जो शब्दों को नये सिरे से संस्कार देते हैं तथा नये शब्दों का निर्माण करते हैं.

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