केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न्यायपालिका की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि इसने कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया है. उत्तराखंड में सरकार की बहाली और देश के दस राज्यों में सूखे पर सर्वोच्च न्यायालय के कठोर रवैये की पृष्ठभूमि में इस बयान को सरकार की बेचैनी का संकेत माना जा रहा है. इससे पहले अक्तूबर में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को निरस्त करने के बाद भी जेटली ने कहा था कि भारत में लोकतंत्र ‘अनिर्वाचितों का अधिनायकवाद’ नहीं हो सकता है.
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हमारे लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ हैं. संविधान में इनके कार्य और अधिकार निर्दिष्ट हैं. बावजूद इसके, इनके बीच खींचतान की स्थितियां पैदा होती रही हैं. कई न्यायिक निर्णयों को लेकर कहा गया है कि न्यायपालिका ने विधायिका या कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण किया है.
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति पैदा क्यों होती है? उत्तराखंड में राजनीतिक दलों के बीच भरोसे के संकट की स्थिति इतनी विकट हो गयी थी कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने ही सुप्रीम कोर्ट से न्याय की गुहार लगायी थी. इसी तरह सूखे के संकट पर सरकार की नींद तब टूटी, जब एक नागरिक संगठन ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया.
जब भी सरकारों और राजनेताओं से अपने अधिकारों और कर्तव्यों के पालन में चूक हुई है, प्रभावित लोगों-संगठनों ने न्याय की आखिरी उम्मीद के साथ न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया है और न्यायपालिका ने सरकार को जरूरी निर्देश दिये हैं. ऐसी स्थिति न आने देने के उपायों के प्रति सरकार को गंभीर होना चाहिए. साथ ही पूरे राजनीतिक समुदाय को जनता की समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर होना चाहिए.
जिन मामलों में सरकारी एजेंसियां अपना काम सही तरीके से करती हैं, उनमें न्यायालय की निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती. आज जनता को यदि सरकारों से अधिक भरोसा न्यायालयों पर है, तो इसके कारणों पर सरकारों के साथ-साथ सभी राजनीतिक दलों को ईमानदारी से आत्ममंथन करने की जरूरत है. न्यायपालिका की आलोचना करने से स्थिति सुधरने के बजाय टकराव और बढ़ेगा ही.

