पाक का दोमुंहापन

Updated at : 27 Apr 2016 1:12 AM (IST)
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पाक का दोमुंहापन

‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और’- पाकिस्तान पर यह कहावत अक्सर सटीक बैठती है, जब बात भारत के साथ संबंधों की होती है. मंगलवार को विदेश सचिव स्तर की वार्ता के क्रम में भी यही हुआ. खबरों के मुताबिक पाक विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी ने अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर के […]

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‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और’- पाकिस्तान पर यह कहावत अक्सर सटीक बैठती है, जब बात भारत के साथ संबंधों की होती है. मंगलवार को विदेश सचिव स्तर की वार्ता के क्रम में भी यही हुआ.
खबरों के मुताबिक पाक विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी ने अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर के साथ बातचीत में जहां यह कहा कि उनका देश भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते बहाल करने के लिए वचनबद्ध है, वहीं यह राग अलापना भी नहीं भूले कि भारत-पाक के बीच विवाद का असल मुद्दा अगर कुछ है, तो वह है कश्मीर. उनके तेवर कुछ ऐसे थे, मानो वार्ता 2016 में नहीं, 1946 के मई महीने यानी कैबिनेट मिशन के वक्त हो रही हो! दोनों देशों के संबंधों पर नजर रखनेवाला शायद ही कोई होगा, जो यह न माने कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी विदेश नीति एक मनोग्रंथि का शिकार है.
यह मनोग्रंथि उसे कश्मीर की मौजूदा सच्चाई देखने ही नहीं देती और वह मेलजोल के हर मौके को खींच कर ऐन 1947 के तुरंत बाद दिनों में ले जाना चाहता है, जब कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में गूंजा था. सच्चाई यह है कि 2016 में कश्मीर भारत का वैसा ही स्वाभाविक प्रांत है, जैसे कि उसके अन्य प्रांत. वहां अन्य भारतीय राज्यों की तरह ही जनता की नुमाइंदगी करनेवाली निर्वाचित सरकार है. इस सच्चाई को स्वीकार न करने के कारण ही पाकिस्तान कभी सीधे युद्ध में उतर आता है, जैसे करगिल युद्ध, तो कभी अपने आतंकियों के कंधे पर बंदूक रख कर छद्म-युद्ध लड़ता है, जैसे पठानकोट हमला.
हद तो यह है कि जब वह संबंधों के सुधार के नाम पर वार्ता के लिए तैयार होता है, तब भी उसके मन में युद्ध ही चल रहा होता है और इसी कारण मेलजोल का मंच तकरार के मंच में बदल जाता है. विदेश सचिव स्तर की वार्ता के मौके पर कश्मीर का राग अलाप कर एजाज चौधरी ने फिर यही किया. चौधरी की कोशिश में कोई कसर बाकी न रहे, इसका जिम्मा पाक उच्चायोग ने उठाया और बातचीत खत्म होने से पहले ही घोषणा कर दी कि पाक प्रेरित आतंकवाद नहीं, बल्कि कश्मीर ही दोनों देशों के बीच विवाद का बिंदु है.
पड़ोसी बदले तो नहीं जा सकते, पर उनकी मनोग्रंथि की चपेट में आने से खुद को बचाया जा सकता है. जब तक पाकिस्तान अपनी कश्मीर-ग्रंथि से उबर नहीं जाता, भारत के लिए ठीक यही है कि जैसे को तैसा की नीति पर चलते हुए वह पाक प्रेरित आतंकवाद का मुद्दा आपसी बातचीत में और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाता रहे, ताकि पाकिस्तान के आतंकी गुटों से हुकूमत की मिलीभगत दुनिया के सामने उजागर होती रहे.
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