आजादी के सातवें दशक में भी हिंदी की उपेक्षा

Updated at : 26 Apr 2016 12:53 AM (IST)
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आजादी के सातवें दशक में भी हिंदी की उपेक्षा

कुछ दिनों से देखा जा रहा है झारखंड की सरकारी सूचनाएं, जो हिंदी अखबारों में प्रकाशित होती हैं वह अंगरेजी में होती हैं. यह अहसास दिलाता है कि हम आज भी अंगरेजों के गुलाम हैं. जो सूचना झारखंड के आम नागरिकों के लिए होती है उसे अंगरेजी में छापने का क्या मतलब है. क्या सरकार […]

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कुछ दिनों से देखा जा रहा है झारखंड की सरकारी सूचनाएं, जो हिंदी अखबारों में प्रकाशित होती हैं वह अंगरेजी में होती हैं. यह अहसास दिलाता है कि हम आज भी अंगरेजों के गुलाम हैं. जो सूचना झारखंड के आम नागरिकों के लिए होती है उसे अंगरेजी में छापने का क्या मतलब है.

क्या सरकार चाहती है कि जनता उसे पढ़े तो जरूर, लेकिन समझे नहीं. झारखंड एक हिंदी भाषी राज्य है. लोग िहंदी भी मुश्किल से समझते हैं, अंगरेजी तो बिल्कुल उपर से पार हो जायेगी. आजादी के 69 वर्ष हो गये, हिंदी में सारे काम हों, यह हम सुनिश्चित नहीं कर पाये. न्यायालय में सारे काम आज भी अंगरेजी में होते हैं. वादी को अपने केस में संबंध में कुछ पता नहीं चल पाता. हम ज़ोर- शोर से हिंदी दिवस मानते हैं. मानो हिंदी मृत हो गयी है. देश में राजभाषा के साथ ऐसा व्यवहार हमें मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है.

नवीन कुमार सिन्हा, जमशेदपुर

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