''भारत'' माता या पिता?
Updated at : 22 Apr 2016 6:08 AM (IST)
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डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार मैं शुरू में ही इस बात को स्पष्ट कर दूं कि मैं एक निहायत देशभक्त किस्म का बंदा हूं और अपनी इस देशभक्ति के चलते उन देशवासियों को हेय दृष्टि से देखता हूं, जो अपना सारा काम-धंधा छोड़ भारत माता की जय बोलते रहने को फालतू का काम समझते हैं. […]
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डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
मैं शुरू में ही इस बात को स्पष्ट कर दूं कि मैं एक निहायत देशभक्त किस्म का बंदा हूं और अपनी इस देशभक्ति के चलते उन देशवासियों को हेय दृष्टि से देखता हूं, जो अपना सारा काम-धंधा छोड़ भारत माता की जय बोलते रहने को फालतू का काम समझते हैं. भारत माता की जय बोलना ही सभी देशभक्तों की तरह मेरी भी निगाह में देशभक्ति का एकमात्र सबूत है, जिसे थोड़े-थोड़े समय बाद प्रदर्शित करते रहना जरूरी है.
देशभक्ति में भक्ति-भाव चित्त में नहीं, जुबां पर होना चाहिए. देशभक्ति अगर आपकी जुबां पर चढ़ कर बोलती है, तो फिर चित्त में अगर देशविरोधी भाव भी हों तो चलेगा. असल में देशभक्ति का भाव देशभक्त के सारे भावों और कृत्यों को देशभक्ति के दायरे में ले आता है. उसी तरह, जैसे समाधि लगने पर कबीर जो कुछ करते हैं, वही ईश्वर की पूजा हो जाती है- कहूं सोई नाम, सुनूं सोई सुमिरन, खाऊं-पिऊं सो पूजा/ जहां-जहां जाऊं सोई परिकरमा, जो कुछ करूं सो सेवा//अपनी इस देशभक्ति के चलते मैं अपने मन में उन विदेशियों के प्रति भी भारी वैमनस्य रखता हूं, जिन्होंने मेरा कभी कुछ नहीं बिगाड़ा, बल्कि जिनसे मैं कभी मिला भी नहीं. यह जो मेरी गरदन कभी राह चलते मिल जानेवाले अंगरेजों (सभी गोरे विदेशी) को देख कर कदमों में बिछ जाने की-सी हद तक झुक जाया करती है, सो उनके प्रति सम्मान के कारण नहीं, बल्कि नफरत के कारण झुकती है.
और मैं घबराहट प्रदर्शित करता हुआ-सा उचक कर उनके लिए जो रास्ता छोड़ दिया करता हूं, सो भी असल में घबराहट के कारण नहीं करता, बल्कि गुस्से के कारण कि कहीं वे मुझसे ख्वाहमख्वाह पिट-विट न जायें.
मेरी देशभक्तिजन्य घृणा का शिकार यों तो सभी विदेशी होते हैं, पर पड़ोसी देश के नागरिक स्वभावत: ज्यादा होते हैं. अपने पड़ोसी से जिस तरह हम अकारण ही, या सिर्फ इसलिए कि वह हमारा पड़ोसी है, सबसे ज्यादा चिढ़ते हैं और उसे जरा भी सफल होते नहीं देखना चाहते, उसी तरह हम पड़ोसी मुल्क के साथ करते हैं. क्रिकेट या हॉकी में पाकिस्तान को हारता देखने के लिए हम जो एड़ी-चोटी का ही नहीं, स्थान-विशेष तक का जोर लगा देते हैं, सो इसी कारण.
लेकिन आम देशभक्त होने के कारण मैं अपनी देशभक्ति का कोई भौतिक लाभ नहीं उठा पाता, जैसे कि खास देशभक्त उठा लेते हैं. निम्न से निम्न कोटि का खास देशभक्त भी और कुछ नहीं, तो देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का ठेका तो जुगाड़ ही लेता है.
उच्च कोटि के खास देशभक्तों की तो फिर बात ही अलग है, जो अपनी देशभक्ति के कांटे में पूरे देश तक को मछली की तरह फांस लेते हैं. उनकी देशभक्ति एक खास नूसंस वैल्यू यानी विघ्नकारी महत्व रखती है, जिससे उनके मार्ग के समस्त विघ्न दूर हो जाते हैं. अपनी देशभक्ति के बल पर वे कुछ न होते हुए भी अपने को बहुत-कुछ समझते हैं और जो असल में बहुत-कुछ होते हैं, उन्हें कुछ नहीं समझते.
और इधर मेरी देशभक्ति का यह आलम है कि भारत माता की जय बोलने से पहले यही सोच कर हिचक जाता हूं कि कहीं व्याकरणिक दृष्टि से गलत तो नहीं कर रहा. ‘भारत’ शब्द पुलिंग है, तो उसे माता कैसे कहूं? बाकी देशभक्त कैसे बेहिचक कह लेते हैं, समझ नहीं आता. कहीं उन्होंने सरकारी तौर पर व्याकरण के नियम बदलवा कर ‘भारत’ शब्द को आधिकारिक रूप से स्त्रीलिंग तो नहीं करवा लिया? मेरी यह ऊहापोह ही बता देती है कि मैं बिलकुल आम किस्म का देशभक्त हूं, जिसका कुछ नहीं हो सकता.
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