हमारे समाज की दशा और दिशा

Updated at : 23 Dec 2013 4:36 AM (IST)
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हमारे समाज की दशा और दिशा

।। महेंद्र कुमार खेतान।।(सामाजिक कार्यकर्ता) वैसे तो पूरा देश ही एक दिशाहीन भ्रमित स्थिति में खड़ा है, जहां अर्थ ही जीवन का अर्थ होकर रह गया है. शिक्षा से नैतिकता का पाठ गायब है. परिवार संस्कार-विहीन हो रहे हैं. नेता पतित हो चुके हैं. इन सबके बीच हम आज मारवाड़ी समाज को कहां खड़ा पाते […]

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।। महेंद्र कुमार खेतान।।
(सामाजिक कार्यकर्ता)

वैसे तो पूरा देश ही एक दिशाहीन भ्रमित स्थिति में खड़ा है, जहां अर्थ ही जीवन का अर्थ होकर रह गया है. शिक्षा से नैतिकता का पाठ गायब है. परिवार संस्कार-विहीन हो रहे हैं. नेता पतित हो चुके हैं. इन सबके बीच हम आज मारवाड़ी समाज को कहां खड़ा पाते हैं? हमारी पहचान किन चीजों से होती है? शिक्षा के क्षेत्र में हमने काफी उन्नति की है, इसमें कोई संदेह नहीं. विशेषकर महिला शिक्षा की दिशा में. सामाजिक कार्यो में, गरीबों की मदद करने में, दान वगैरह के क्षेत्र में आज भी अन्य समुदायों से मारवाड़ी समाज कहीं आगे है. इक्का-दुक्का अरविंद केजरीवाल एवं अशोक खेमका जैसे ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ राजनीतिज्ञों/ अधिकारियों ने भी हमारा गौरव बढ़ाया है.

फिर भी हमारी आत्मा हमें क्यों कचोटती है? क्यों हम यह महसूस कर रहे हैं कि समाज की चेतना सुप्त है, हमारी दिशा सही नहीं है? हम अपनी सामूहिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में दिनोंदिन अशक्त होते जा रहे हैं. आजकल हमारे समाज द्वारा आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में अवांछित आडंबर एवं पैसों का जघन्य अपव्यय हो रहा है. अत्यंत गंभीरता एवं संजीदगी से हमें इस विषय पर चिंतन करना होगा. हम जो भागवत-कथा, कीर्त्तन आदि करवा रहे हैं उनमें दिखावा, नित नया कुछ करने की एक अंतहीन होड़ लगी है. आखिर इन सबसे किसका भला हो रहा है? समाज को या व्यक्ति को क्या लाभ मिल रहा है?

क्या नैतिक उत्थान की लेशमात्र छाया भी दिखायी दे रही है? अथवा भक्ति-भावना जो स्वयं में ही समस्त बुराइयों को दूर करनेवाली है- के किंचित छींटे भी हम महसूस कर रहे हैं? समाज के अग्रधारों को इसका समाधान निकालना होगा. आचरण के बगैर धर्म अर्थहीन है. सिर्फ कर्मकांड हमें मानसिक शांति अथवा मोक्ष प्रदान नहीं कर सकता. आज से 40-50 वर्षो पूर्व लोग दिवाला निकालते थे, तो अत्यंत मजबूरी में. ऐसी स्थिति में लोग लज्जा से या तो आत्महत्या कर लेते थे अथवा किसी को मुंह नहीं दिखाते थे. हालात ठीक होने पर लोगों का बकाया फिर से चुका कर परम संतोष की प्राप्ति करते थे. परंतु आज लोग स्वार्थवश एवं योजनाबद्ध तरीके से यह काम कर रहे हैं. समाज में तात्कालिक चरचा तो होती है, परंतु दोषी को दंड का कतई भय नहीं होता. 5-10 वर्षो के अंदर वही व्यक्ति जिसने लोगों को जान-बूझ कर आर्थिक नुकसान पहुंचाया, वो करोड़पति-अरबपति बन कर संस्थाओं से जुड़ कर छोटा-मोटा दान करके संस्थाओं के अध्यक्ष पद की शोभा बढ़ाता है. लोग भी स्वार्थवश या चाटुकारिता हेतु उसकी जय-जयकार करने में पीछे नहीं रहना चाहते.

संयुक्त परिवार का ढांचा बिखर रहा है. जब मनुष्य स्वार्थी एवं भोगवादी हो जाता है, तो वह स्वयं के बारे में सोचने लगता है. यहीं से परिवार की टूट प्रारंभ होती है. त्याग एवं आपसी सामंजस्य से यह समस्या सुलझायी जा सकती है. हम बहुत वर्षो से शादियों में आडंबर, फिजूलखर्ची की चर्चा, निंदा करते आ रहे हैं, परंतु फल कुछ नहीं निकला. अपितु यह कहावत चरितार्थ हुई कि मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की. क्या विवाह जैसा पवित्र सामाजिक बंधन अब सिर्फ खेल अथवा पैसों की प्राप्ति/ खर्च का साधन मात्र रह गया है? सवाल है कि शादी के खर्च में से कितना खर्च सार्थक मदों में होता है एवं कितना दिखावा-आडंबर इत्यादि पर? चिंतन होना चाहिए कि शादी में जो खर्च हम करते हैं, उसका कुछ प्रतिशत समाज के गरीब लड़के-लड़कियों की शादी पर किया जाये.

हमारे समाज की महिलाओं के दैनिक जीवन पर एक दृष्टि डालें, तो उनका जीवन कतिपय गतिविधियों में सीमित नजर आता है. ज्यादातर महिलाएं टीवी न्यूज या अखबार के माध्यम से होनेवाली साधारण जानकारियों से अनभिज्ञ मिलेंगी. वैश्विक घटनाओं, चाहे वे राजनीतिक हों या आर्थिक, सामाजिक हों या खेलकूद, सांस्कृतिक हों या शैक्षिक, इन सबसे वो या तो पूरी तरह अनजान हैं अथवा उदासीन. बच्चों में आज आधुनिकता बढ़ रही है. इसलिए बच्चों में आरंभ से ही योगासन, प्राणायाम की आदतें डालनी होगी. अगर हम अपने बच्चों को बचपन से ही ललित कला (संगीत, चित्रंकन आदि), खेल-कूद इत्यादि की एक विधा से गंभीरता से जोड़ दें, तो वो इन क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाने के साथ-साथ परिवार एवं समाज का नाम भी रोशन कर सकते हैं. इन दोनों क्षेत्रों में असीम संभावनाएं हैं.

सारांश यही है कि पैसों को प्रधानता देना उचित है, पर उसका सदुपयोग ज्यादा आवश्यक है. अगर हमने अपने नौकर-चाकरों, कर्मचारियों, भाई-बंधुओं, रिश्तेदारों, पड़ोसियों के बारे में सोचना बंद कर दिया, तो क्षणिक भौतिक सुख तो प्राप्त होगा, पर चिरस्थायी आत्मिक शांति हमसे हमेशा दूर ही रहेगी. भोगवाद हमें विनाश की ओर ले जायेगा- यह शाश्वत सत्य है.

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