हिंदी का लेखक होना

Updated at : 03 Mar 2016 12:09 AM (IST)
विज्ञापन
हिंदी का लेखक होना

यह कहानी मुझे मनोहर श्याम जोशी ने सुनायी थी. बात अस्सी के दशक के आरंभिक वर्षों की है. एक बार जोशी जी के घर में महान लेखक अज्ञेय बैठे हुए थे कि तभी जोशी जी के एक रिश्तेदार उनसे मिलने आये. जोशी जी ने हुलसकर अपने उस रिश्तेदार का परिचय अज्ञेय जी से करवाते हुए […]

विज्ञापन

यह कहानी मुझे मनोहर श्याम जोशी ने सुनायी थी. बात अस्सी के दशक के आरंभिक वर्षों की है. एक बार जोशी जी के घर में महान लेखक अज्ञेय बैठे हुए थे कि तभी जोशी जी के एक रिश्तेदार उनसे मिलने आये.

जोशी जी ने हुलसकर अपने उस रिश्तेदार का परिचय अज्ञेय जी से करवाते हुए कहा कि ये हिंदी के बहुत बड़े लेखक हैं. उनके रिश्तेदार ने छूटते ही कहा कि लेखक तो ठीक हैं, लेकिन करते क्या हैं? प्रसंग करीब 35 साल पुराना है, लेकिन आज भी हालात अधिक नहीं बदले हैं.

हिंदी में लेखक की सिर्फ लेखक के रूप में पहचान आज भी नहीं है. हिंदी के जो ‘बड़े’ लेखक होते हैं, माने जाते हैं वे पहले प्रोफेसर होते हैं, पत्रकार होते हैं, सरकार में बड़े ओहदेदार होते हैं, उसके बाद लेखक होते हैं. अपवादों को छोड़ दें, तो अपने लेखन के बूते हिंदी के लेखकों की व्याप्ति हिंदी समाज में बहुत कम बन पायी है.

न तो हिंदी के प्रकाशक, न ही हिंदी मीडिया हिंदी के लेखकों को अपने ‘ब्रांड’ के रूप में पेश करता है. उसके अंदर शायद इस बात को लेकर या तो हीन भाव रहता है या आत्मविश्वास की कमी कि पता नहीं हिंदी लेखक का लेख या किसी मुद्दे पर उसकी राय छापेंगे, तो पाठकों की क्या प्रतिक्रिया होगी. जबकि, अंगरेजी के हलके-फुल्के लेखकों को भी हिंदी में बड़े शान से छापा जाता है. इस समय हिंदी में अंगरेजी सहित तमाम विदेशी भाषाओं से बड़ी संख्या में पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं,

हर साल उनकी तादाद हिंदी में छपनेवाली मौलिक किताबों से अधिक कम नहीं होती है. उनके ऊपर प्रकाशकों का खर्च भी अधिक आता है, अनुवादक को भुगतान करना पड़ता है. लेकिन वही प्रकाशक हिंदी में मौलिक किताबों, नये लेखकों पर दांव नहीं लगाता, क्योंकि उसको विश्वास नहीं होता कि ऐसे लेखकों की किताबें चल पायेंगी.

आजकल एक नया चलन है हिंदी में ग्लैमर की दुनिया से जुड़े लोगों की किताबें छापने का. कोई फिल्मों में गीत लिख कर चर्चित हो जाता है, उसकी किताब छापने की होड़ मच जाती है. कोई किसी विवाद में पड़ जाता है, उसकी किताब छापने की होड़ मच जाती है. कहने का मतलब है कि लेखक को कुछ नहीं समझा जाता है, बल्कि जो कुछ और होता है उसको लेखक बनाया जाता है. यानी लेखक होने के कारण किसी को सम्मान नहीं मिलता, उसकी हिंदी समाज में व्याप्ति नहीं होती, बल्कि वह कुछ और होता है, इसलिए वह लेखक होता है.

कहा जा सकता है कि अब हिंदी की दुनिया बदल रही है. हाल के वर्षों में मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग सहित अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग हिंदी लेखन में आये हैं. हिंदी को लेकर वह सोच भी बदल रही है कि हिंदी कौन पढ़ता है, हिंदी गरीब-गुरबों की भाषा है. हिंदी में काम करनेवालों के प्रति नजरिया बदल रहा है. लेकिन, यह अभी भी झूठा सच है. केंद्र में बैठे लोगों को लगता है कि भाषा की व्याप्ति बढ़ रही है, उसका पाठक वर्ग बढ़ रहा है.

जैसे ही परिधि में यानी छोटे-छोटे नगरों में जाते हैं, तो इस बात से मोहभंग हो जाता है. वहां हिंदी को लेकर नजरिया आज भी नहीं बदला है, आज भी अंगरेजी शान की भाषा बनी हुई है. जब भाषा को लेकर ही नजरिया नहीं बदला है, तो इसके लेखकों के प्रति क्यों बदलेगा? आज भी हिंदी का लेखक पहले ‘कुछ’ होता है, तभी लेखक कहलाता है.

वह क्या होता है, इससे यह तय होता है कि उसका लेखकीय कद कितना बड़ा होगा. कमोबेश यही आज की सच्चाई है. इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी का बाजार बन रहा है, बढ़ रहा है. लेकिन, क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि लेखकों के प्रति समाज का रवैया भी बदलेगा?

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola