मोदी-अमित शाह की प्रभावी जोड़ी

Updated at : 02 Feb 2016 6:22 AM (IST)
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मोदी-अमित शाह की प्रभावी जोड़ी

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया सितंबर, 2009 में अमित शाह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के लिए परचा दाखिल करने जा रहे थे. उनके साथ कार में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. कहानी के मुताबिक, जैसे ही वे कार्यालय के निकट पहुंचे, मोदी ने अपना मन बदल दिया और […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
सितंबर, 2009 में अमित शाह गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के लिए परचा दाखिल करने जा रहे थे. उनके साथ कार में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. कहानी के मुताबिक, जैसे ही वे कार्यालय के निकट पहुंचे, मोदी ने अपना मन बदल दिया और शाह से कहा- ‘नहीं यार, हूंज बनु’ (सोचता हूं कि मैं ही यह पद ले लूं).
अंतिम क्षणों में नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गये और चिर निष्ठावान अमित शाह को इससे कोई दिक्कत नहीं हुई. कांग्रेस के पास शाह जैसा कोई व्यक्ति नहीं है. अमित शाह निष्ठावान और सक्षम हैं और नरेंद्र मोदी उन पर इतना अधिक भरोसा करते हैं कि उन्होंने उन्हें पार्टी की स्वतंत्र कमान दे दी है. राजनीतिक रूप से शाह भाजपा में द्वितीय स्थान पर हैं.
इस साल जनवरी की 24 तारीख को शाह फिर से भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष चुने गये हैं और इस प्रभार को वे अगले तीन साल तक संभालेंगे. इस दौरान उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु जैसे कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान अमित शाह पार्टी का नेतृत्व करेंगे.
इनमें से कई राज्यों में भाजपा अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रही है और, जैसा कि दलित नेता कांशीराम ने एक बार कहा था, चुनाव ही ऐसा अवसर है जब पार्टी को बढ़ाया और विस्तारित किया जा सकता है. मुझे ऐसा लगता है कि 2016 चुनावी रूप से अमित शाह और भाजपा के लिए अच्छा साल होगा.
मीडिया में ऐसा प्रस्तुत किया गया कि 2015 भाजपा के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा था. उसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने किनारे लगा दिया और बिहार में उसे जनता दल यूनाइटेड-राष्ट्रीय जनता दल- कांग्रेस के महागंठबंधन के हाथों अप्रत्याशित रूप से भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ा. लेकिन, अगर इससे शाह के आत्मविश्वास पर असर पड़ा भी हो तो उन्होंने इसे जाहिर नहीं किया है, और यह ठीक भी है. दोनों राज्यों में उन्होंने भाजपा का जनाधार बरकरार रखा है.
वे दिल्ली में सिर्फ अरविंद केजरीवाल (जो नरेंद्र मोदी के साथ हमारे समय के सबसे तेजतर्रार राजनेता हैं) की मौजूदगी से हारे तथा बिहार में शाह को बाहर रखने के लिए सभी अन्य दलों को साथ आना पड़ा था. गुजरात में, जहां आरक्षण के मुद्दे पर पाटीदार समुदाय के विद्रोह के कारण कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी, भाजपा ने सभी बड़े नगर निगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है. गुजरात भारत का सर्वाधिक शहरीकृत राज्य है.
कुल मिलाकर अब भी भाजपा के लिए स्थितियां सकारात्मक हैं. इसका एक कारण अमित शाह की प्रतिभा है. वे एक जोरदार संगठनकर्ता हैं और अपनी रणनीतियां जमीनी कार्यकर्ताओं को ध्यान में रखते हुए तय करते हैं. वर्ष 2008 में डेमोक्रेटिक प्रत्याशी बनने के बराक ओबामा के अभियान के बारे में कहा जाता है कि ‘जमीनी खेल’ के कारण ही उन्हें सफलता मिली थी. इसका मतलब प्रत्याशी की प्रतिभा के बदले साजो-सामान और गतिविधियों से है.
यह कड़ी मेहनत और योजनाबद्धता से संबंधित है. इन चीजों में अमित शाह बहुत अच्छे हैं. वे एक व्यापारिक पृष्ठभूमि के जैन हैं. देखने में वजनी और समृद्ध शाह मध्यवर्गीय गुजराती की तरह के हिंदुत्ववादी हैं, और मोदी के विपरीत वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक भी नहीं हैं. हालांकि वे किसी अन्य संघी कार्यकर्ता की तरह एकाग्र और समर्पित हैं तथा उनकी व्यापारिक पृष्ठभूमि उन्हें चीजों को स्पष्टता और व्यावहारिकता से देखने के लिए सक्षम बनाती है.
पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके निर्वाचन की घोषणा करते हुए बताया गया कि डेढ़ साल के कार्यकाल में पार्टी को बनाने और मजबूत करने के लिए उन्होंने देशभर में रोजाना करीब 500 किलोमीटर की यात्रा की है. कांग्रेस में अपनी पहल पर किसी के द्वारा ऐसा करते हुए कल्पना करना बहुत मुश्किल है. लेकिन अमित शाह निरंतर ऐसा करते रहते हैं. कुछ महीने पहले मैं अहमदाबाद में था, जहां मैंने भाजपा की सदस्यता बढ़ाने का एक बड़ा अभियान देखा, जिसमें मिस्ड कॉल के द्वारा आंकड़े जुटाये जा रहे थे. यह तब किया जा रहा है जब वहां कांग्रेस के जीतने की कोई संभावना नहीं है.
करीब 11 साल पहले जब मैं अहमदाबाद में काम करता था, मुझे अमित शाह से बातचीत का मौका मिला था. मीडिया के प्रति अविश्वास से भरे रूखे स्वभाव के व्यक्ति थे.
जहां तक मैं जानता हूं, उनसे नियमित रूप से मिलने और बात करने की अनुमति सिर्फ एक ही पत्रकार को है, जो कि रेडिफ और इंडियन एक्सप्रेस की शीला भट्ट हैं, और अमित शाह के साथ उनके जुझारू, किंतु धैर्यपूर्ण साक्षात्कार ज्ञानवर्द्धक हैं. मुझे लगता है कि भट्ट को मौका दिये जाने का एक कारण उनका गुजराती-भाषी होना है, जिसमें शाह सर्वाधिक सहज हैं.
अमित शाह के ठोस प्रभार में नरेंद्र मोदी निश्चिंत हैं कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे असंतुष्टों के बहुत अधिक हस्तक्षेप के बिना वे अपनी चुनावी रणनीति को तैयार और अमल में ला सकते हैं. यह भागीदारी प्रभावी और अर्थपूर्ण है, तथा लालकृष्ण आडवाणी-अटल बिहारी वाजपेयी की जोड़ी के उलट, यहां प्रमुख यानी नंबर वन के बारे में पूरी स्पष्टता है. नरेंद्र मोदी के लिए राज्यसभा में बहुमत जीतने की जुगत में 2016 के विधानसभा चुनावों में शाह के तौर-तरीकों को देखना दिलचस्प होगा.
मैंने लेख की शुरुआत गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन की कहानी से की थी, और मैं उस दिन से पांच साल बाद, 2014 की कहानी से इसे समाप्त करूंगा, जब मोदी प्रधानमंत्री बन गये और उन्होंने एसोसिएशन के अपने पद से इस्तीफा दे दिया. तब इसका नया अध्यक्ष कौन बना? अमित शाह.
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