असहिष्णुता और आर्थिक विकास

Updated at : 02 Feb 2016 6:20 AM (IST)
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असहिष्णुता और आर्थिक विकास

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री तर्कवादी विचारक कलबुर्गी की हत्या के बाद देश में असहिष्णुता पर बहस छिड़ी थी. कई लेखकों ने सम्मान वापस किये थे. अब कुछ लेखकों ने वापस किये सम्मान को पुनः स्वीकार करने की बात कही है. यहां चिंता और चिंतन का विषय है कि यह बहस उठी ही क्यों? समाज के […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
तर्कवादी विचारक कलबुर्गी की हत्या के बाद देश में असहिष्णुता पर बहस छिड़ी थी. कई लेखकों ने सम्मान वापस किये थे. अब कुछ लेखकों ने वापस किये सम्मान को पुनः स्वीकार करने की बात कही है.
यहां चिंता और चिंतन का विषय है कि यह बहस उठी ही क्यों? समाज के श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा व्यवहार करते हैं, आम जनता सहज ही उसी रास्ते पर चल पड़ती है. असहिष्णुता की बहस ने लोगों के मन में एक संदेह पैदा किया है, जो सरकार के आर्थिक विकास के एजेंडे को हताहत कर सकता है. सरकार चाह रही है कि भारत को विश्व अर्थव्यवस्था में सम्मानित स्थान पर स्थापित किया जाये. हम विदेशी निवेश और आधुनिक तकनीक हासिल करना चाह रहे हैं.
सत्तर के दशक में दक्षिण अफ्रीका में श्वेतों की सरकार थी. अश्वेतों को कई मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया था. फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तमाम प्रतिबंध लगाये. वहां निवेश करनेवाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों के सामने प्रदर्शन हुए. दक्षिण अफ्रीका में बने माल को विकसित देशों में प्रवेश नहीं दिया गया. उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा गयी.
अंत में उसको रंग-भेद समाप्त करना पड़ा. हाल में अमेरिका में मोदी के विरोध में भी स्वर उठने लगे हैं. संभव है कि अमेरिकी सीनेट में कोई कानून पास हो और भारत में निवेश करनेवाली अमेरिकी कंपनियों पर किसी तरह का प्रतिबंध लगा दिया जाये.
असहिष्णुता के वातावरण का अर्थव्यवस्था पर दूसरा प्रभाव सही नीतियों के निर्धारण के माध्यम से पड़ता है. सत्ता को टिकाऊ बनाने में सबसे कठिन कार्य नीति-निर्धारण होता है. उद्यमी तथा मैनेजर में अंतर होता है. उद्यमी नीतियों का निर्धारण करता है और मैनेजर उन नीतियों को लागू करता है. वर्तमान सरकार द्वारा कई गरीब-विरोधी नीतियां लागू की जा रही हैं. साथ ही संकीर्ण हिंदुत्व एजेंडे को लागू किया जा रहा है. संस्कृत भाषा और गोहत्या पर प्रतिबंध आदि ऐसे ही मुद्दे हैं. ऐसे एजेंडे के लागू होने से समाज का एक वर्ग अति प्रसन्न है.
इस वर्ग को इससे कोई वास्ता नहीं है कि सरकार की नीतियों का संपूर्ण जनता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. इसलिए मनरेगा में कटौती, भूमि अधिग्रहण में जबरदस्ती, गंगा पर बराज बना कर मछुआरों को दुख देना, जंगल को काटने देने जैसी कई नीतियां केंद्र द्वारा लागू की जा रही हैं. सरकार संकीर्ण दृष्टि रखनेवाली आइएएस लाॅबी से घिर गयी है. फलस्वरूप आम जनता की परेशानियां बढ़ रही है. बढ़ती महंगाई के कारण उसकी क्रय शक्ति घट रही है. इससे देश सामाजिक विघटन की ओर तेजी से बढ़ रहा है.
लेकिन, यह विषय प्रधानमंत्री तक नहीं पहुंच रहा है, क्योंकि निंदकों को पास नहीं रखा गया है. निंदक पास तभी रह सकता है, जब खुलेपन का वातावरण हो.
अगला प्रभाव जनता की मानसिक शक्ति के कार्यान्वित होने का है. व्यक्ति यदि खुल कर सोचेगा, तो परिवार में बच्चों के साथ, व्यापार में ग्राहक के साथ और मसजिद में मौलाना के साथ भी खुल कर सोचेगा. सोलहवीं सदी में यूरोप में पुराने फ्यूडल वैचारिक बंधनों को तोड़ दिया गया.
धर्म और राजतंत्र के विरोध में सोचने-बोलने की परंपरा स्थापित हुई. लोगों के दिमाग खुले. तब 1781 में जेम्स वाॅट महोदय ने स्टीम इंजन का आविष्कार किया. इस वैचारिक क्रांति का परिणाम औद्योगिक क्रांति के रूप में हमारे सामने है. वाॅट का दिमाग यदि धर्म के क्षेत्र में भयाक्रांत रहता, तो संभवतः वह यह आविष्कार न कर पाते.
भारत का अनुभव भी ऐसा ही रहा है. 12वीं सदी में अपने देश में वैचारिक खुलापन था. जैन, बौद्ध और सनातनी हिंदू एक साथ रहते थे. इस धार्मिक खुलेपन से हमारी अर्थव्यवस्था में भी खुलापन था.
इससे हमारे नागरिक विश्व व्यापार में अनूठे थे. उन्हें घर लौटते वक्त यह डर नहीं रहता था कि धर्म के नाम पर उन्हें जेल में डाल दिया जायेगा. उस समय विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा करीब 25 प्रतिशत था. इसके बाद औरंगजेब ने हिंदू मंदिरों को तोड़ने के फरमान जारी किये. देश में असहिष्णुता का वातावरण बना. भारतीय व्यापारी दुबक गये.
बाद में ब्रिटिश सरकार ने धर्म परिवर्तन मुहिम छेड़ी. 1891, 1896 और 1897 में धार्मिक दंगे हुए. व्यापारी पुनः सहम गये. इससे दौ सौ वर्षों में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 25 प्रतिशत से घट कर मात्र एक प्रतिशत रह गया. उस समय भारत को यदि सहिष्णुता का वातावरण मिला होता, तो वह व्यापार में जुटा रहता और आज अर्थव्यवस्था की दुर्गति न होती.
इसलिए मोदी सरकार को लेखकों द्वारा सम्मान पुनः स्वीकार करने से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि विचार करना चाहिए कि यह विवाद उठा ही क्यों. देश की शासन व्यवस्था में खुलापन लाना चाहिए, क्योंकि वैचारिक सहिष्णुता और आर्थिक विकास का चोली-दामन का साथ है.
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