शिक्षा का बाजार

परीक्षाओं में धांधली और रिश्वत के जरिये व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में दाखिला लेने के मामले आये दिन सुर्खियों में रहते हैं. सरकारी संस्थाओं में जहां आपराधिक तरीकों से प्रवेश का धंधा चल रहा है, वहीं निजी संस्थाएं खुलेआम बड़ी धन राशि के एवज में लोगों को दाखिला दे रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर […]
इन सीटों के लिए न तो कोई परीक्षा होती है और न ही किसी तरह की मेरिट की शर्त रखी जाती है. दिलचस्प है कि इन सीटों की उपलब्धता का विज्ञापन भी खुले तौर पर किया जाता है. शिक्षा के व्यापक प्रसार और प्रशिक्षित लोगों को तैयार करने के उद्देश्य से निजी शैक्षणिक संस्थाओं की अनुमति दी जाती है, पर ये संस्थाएं गुणवत्ता के मानदंडों को दरकिनार कर सीटें बेचने का कारोबार कर रही हैं. देश के कुल 422 मेडिकल कॉलेजों में से 224 प्राइवेट हैं जिनमें 53 फीसदी एमबीबीएस की सीटें हैं. इनमें 15,100 सीटें अनिवासी भारतीय और प्रबंधन कोटे की हैं. स्नातकोत्तर स्तर पर कुल 9,808 सीटें इन संस्थाओं में हैं. इन सीटों की कीमत 25 लाख से तीन करोड़ है.
इस संदर्भ में सबसे प्रमुख सवाल तो यह है कि आखिर वह कौन सी मानसिकता है जो अभिभावकों और छात्रों को भारी रकम खर्च कर डिग्रियां हासिल करने के लिए प्रेरित करती है. क्या ऐसे लोगों की सोच देश की स्वास्थ्य सेवा की बेहतरी और बीमारों के ईलाज की होती है या फिर ये लाखों रुपये के अपने निवेश को करोड़ों में बदलने के लालच से ग्रस्त हैं? राजनीतिक दिशाहीनता के कारण हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था बेहद लचर है. कुल चिकित्सकों का 74 फीसदी हिस्सा शहरी क्षेत्रों में कार्यरत है जो देश की 31 फीसदी आबादी की ही सेवा करता है. भारत उन देशों में शामिल है जो अपने बजट का बेहद मामूली हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करता है.
ऐसे में मेडिकल शिक्षा की नीलामी बेहद चिंताजनक है. कुछ साल पहले इसकी बेहतरी के लिए केंद्रीय परिषद बनाने संबंधी विधेयक को ताकतवर स्वार्थी तबके के विरोध के कारण वापस लेना पड़ा था. इंजीनियरों, मैनेजमेंट प्रशिक्षुओं और अन्य स्नातकों की बेहद खराब गुणवत्ता और इनके रोजगार लायक न होने के बारे में अक्सर रिपोर्टें आती हैं, पर चिकित्सकों की अक्षमता लोगों के जीवन-मरण के मामले से जुड़ी हुई है. सरकार को इस प्रकरण को तुरंत संज्ञान में लेकर समुचित कदम उठाने चाहिए अन्यथा स्वास्थ्य सेवाएं उत्तरोत्तर पंगु होती जायेंगी.
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