गहराता कृषि संकट

Updated at : 23 Jan 2016 12:41 AM (IST)
विज्ञापन
गहराता कृषि संकट

खाद्य पदार्थों की वैश्विक कीमतों में गिरावट अगर जारी रही, तो 2016-17 में कृषि क्षेत्र में संकट और अधिक गहरा हो सकता है. नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने यह आशंका जताते हुए कहा है कि 2005 से 2012 के बीच खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी का फायदा भारतीय किसानों को मिला था, […]

विज्ञापन
खाद्य पदार्थों की वैश्विक कीमतों में गिरावट अगर जारी रही, तो 2016-17 में कृषि क्षेत्र में संकट और अधिक गहरा हो सकता है. नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने यह आशंका जताते हुए कहा है कि 2005 से 2012 के बीच खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी का फायदा भारतीय किसानों को मिला था, लेकिन गत दो वर्षों से स्थिति खराब हो रही है.
लगातार दो कमजोर मॉनसून के कारण उत्पादन घटने के बावजूद कीमतें बढ़ नहीं रही हैं. कृषि व उससे जुड़ी गतिविधियों से प्राप्त आय पर भारत की करीब आधी आबादी निर्भर है, लेकिन दो ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था में खेती करीब 15 फीसदी का ही योगदान करती है. देश की करीब 84 करोड़ की ग्रामीण आबादी हर तरह के उत्पादों के लिए बड़ा बाजार है. लेकिन, गिरती ग्रामीण आय अर्थव्यवस्था के विकास को पस्त कर सकती है.
अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को आठ फीसदी के स्तर तक पहुंचाने के लिए खेती की विकास दर कम-से-कम चार फीसदी होनी चाहिए, जबकि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह दर महज 1.9 फीसदी रही थी. साथ ही, पहली तिमाही में ग्रामीण आय की वृद्धि दर 3.3 फीसदी के स्तर पर आ गयी थी, जो 2011 में 20 फीसदी से ऊपर थी. माना जा रहा है कि अब यह दर और कम होकर एक फीसदी के आसपास है.
लोकनीति द्वारा 2014 में किये गये एक सर्वेक्षण में करीब 40 फीसदी किसान अपनी आर्थिक स्थिति से असंतुष्ट पाये गये थे. नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने खेती से परे उपायों से आय बढ़ाने, आसान ऋण उपलब्धता के लिए किसान धन योजना को जन-धन योजना से जोड़ने तथा खेती के हर आयाम में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने जैसे उपाय सुझाये हैं. कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि बड़े निवेश और बड़ी परियोजनाओं की तुलना में खेती में बेहतरी पर सरकार का ध्यान कम है. उनका मानना है कि खाद्य पदार्थों और खेती से संबंधित नीतियों में राज्य का हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण है.
विकास नीतियों पर आम तौर पर परस्पर विरोधी तेवर अपनानेवाले अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और जगदीश भगवती इस बात पर एकमत हैं कि खेती पर देय अनुदानों की समीक्षा जरूरी है, ताकि उनका लाभ छोटे और मझोले किसानों को भी मिल सके. ये दोनों ही दीर्घकालीन विकास और निरंतरता को सुनिश्चित करनेवाली नीतियों के पक्षधर रहे हैं. ऐसी स्थिति में सरकार को सुविचारित नीतिगत पहल की कोशिश करनी चाहिए, ताकि देश का अन्नदाता अपनी परेशानियों से उबर सके और सर्वांगीण विकास की राह प्रशस्त हो सके.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola