देश में हिंसक राजनीति!
Updated at : 23 Jan 2016 12:39 AM (IST)
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आम जनता के लिए खेद की बात है कि अब हमारे देश में भी हिंसक राजनीति बढ़ती ही जा रही है. किसी पर स्याही, पानी, कीचड़, अंडा, जूता आदि फेंकना आम बात हो गयी है. थप्पड़, लात, घूंसा आदि मारना अत्यंत अमानवीय और शर्मनाक हिंसा है, जिसका लोकतंत्र में कहीं कोई स्थान नहीं है. इसकी […]
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आम जनता के लिए खेद की बात है कि अब हमारे देश में भी हिंसक राजनीति बढ़ती ही जा रही है. किसी पर स्याही, पानी, कीचड़, अंडा, जूता आदि फेंकना आम बात हो गयी है.
थप्पड़, लात, घूंसा आदि मारना अत्यंत अमानवीय और शर्मनाक हिंसा है, जिसका लोकतंत्र में कहीं कोई स्थान नहीं है. इसकी हर हाल में कड़ी भर्त्सना के साथ दंड भी जरूरी है, ताकि आगे से ऐसा न हो. मगर, यहां तो थप्पड़ मारनेवाले के घर जाकर ही कुछ तथाकथित नेता मिठाई का डिब्बा ही दे आते हैंं. तब क्या करियेगा? किसी के लिए गलत, गंदे और भद्दे शब्दों और भाषा का प्रयोग और पुतले फूंकना भी एक दूसरी हिंसा है, जो किसी को अपमानित करने के साथ क्रोधित भी कर सकती है. आगजनी और पुतले फूंकना तो एक बड़े प्रदूषण के साथ राष्ट्र की एक बड़ी हानि भी है, जिसकी भरपाई दुर्भाग्य से कोई कर नहीं सकता. अंत में इसका खामियाजा बेचारी जनता को ही भुगतना पड़ता है.
जुलूसों, जलसों और प्रदर्शनों आदि से भी न जाने कितने ही जाम और हादसे अलग से होते हैं, जिनका कोई हिसाब ही नहीं है. सरकार की निरंतर घोर उदासीनता और असंवेदनशीलता यानी इसके अंधी और बहरी होने से यह सब निरंतर बढ़ता जा रहा है. महात्मा गांधी और अन्ना हजारे के शांतिपूर्वक और अहिंसक रास्ते से कोई चलना नहीं चाहता. इसके लिए सर्वप्रथम सरकार को जनमत और मीडिया का पूरा सम्मान करना होगा. सरकार के गलत कार्यों और नीति का विरोध लोकतंत्र में जरूरी है, जो महात्मा गांधी के शांति औए अहिंसा के रास्ते ही उचित है.
मगर, इसके लिए सरकार को भी अपना फर्ज निभाना होगा, जो अब भी पत्थर की मूर्ति बनी हुई है. इसके अलावा हमारे देश के नेताओं को भी किसी भी बेकार और अन्य व्यक्तिगत आलोचना न करके अपने ठोस प्रोग्राम देने होंगे, तभी कुछ सुधार होगा.
– वेद, नरेला
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