जब खाने से पहले दस बार सोचना पड़े
Updated at : 22 Jan 2016 6:23 AM (IST)
विज्ञापन

नासिरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार बिहारी कबाब! जी, सही पढ़ा. कबाब या मांसाहारी खाने का जिक्र होता है तो आमतौर पर लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता या हैदराबाद जैसी जगहों का ही नाम आता है. बिहारी इसमें भी पीछे माने जाते हैं. मैं ऐसा शाकाहारी हूं, जो मांस भी खाता है. इसमें भी मुझे दो चीजें पसंद हैं. दोनों […]
विज्ञापन
नासिरुद्दीन
वरिष्ठ पत्रकार
बिहारी कबाब! जी, सही पढ़ा. कबाब या मांसाहारी खाने का जिक्र होता है तो आमतौर पर लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता या हैदराबाद जैसी जगहों का ही नाम आता है. बिहारी इसमें भी पीछे माने जाते हैं. मैं ऐसा शाकाहारी हूं, जो मांस भी खाता है. इसमें भी मुझे दो चीजें पसंद हैं. दोनों का संबंध बिहार से है. एक है, नदी की मछली (मिष्टिर जलेर माछ) और दूसरा, सीक कबाब. मछली फिर भी मिल जाती है, पर बिहारी कबाब के दीदार कभी-कभार ही हो पाते हैं.
जी, बिहारी सीक कबाब! क्या कहने! गर्मागर्म कबाब से उठती सोंधी खुशबू में जबरदस्त कशिश है. इसे बड़े शहरों के घरों में बनाना कठिन है. झंझटिया कह सकते हैं. इसलिए हम जैसे अप्रवासी बिहारियों के लिए आमतौर पर नायाब है. पिछले दिनों भागलपुर में था. खास तौर पर मेरे लिए ‘छोटे’ का कबाब बना. मैंने खूब खाया और बांध भी लाया. भागलपुर से जिस ट्रेन से आ रहा था, उसमें खाने का न इंतजाम था, न ही कुछ मिल रहा था. भूख से हाल-बेहाल था. बार-बार कबाब की तरफ ध्यान जाता. हाथ झोले की तरफ बढ़ाता, पर कुछ सोच कर रुक जाता.
मेरा ध्यान बार-बार एक खबर में अटक जा रहा था. खबर दो दिन पहले ही पढ़ी थी. एक जोड़ा ट्रेन से कहीं जा रहा था. वे मांस जैसा कुछ खा रहे थे. किसी को लगा कि वे गो-मांस खा रहे हैं.
फिर क्या, मध्य प्रदेश में उनकी पिटाई हो गयी. कुछ दिनों पहले एक की जान जा चुकी थी. मुझे लगा, मैंने कबाब निकाला और उसकी खुशबू फैली और किसी को लगा कि मैं ‘वह’ खा रहा तब! तब तो मेरी शामत आ जायेगी. मैं कहां से सर्टिफिकेट लाऊंगा कि कबाब किस जानवर का है. सो पिटाई से बेहतर है, भूखे ही रहा जाये.
मेरे साथ यह पहली बार नहीं हुआ. अब तो मैं भी दुकान से मांस लाते वक्त सतर्क रहने लगा हूं कि कहीं मुझे तो कोई मारने या धमकाने नहीं आया. आखिर यह कौन-सी चीज है, जो मेरे खाने-पीने को नियंत्रित करने लगी है? मेरे दिमाग के कोने में डर को घर बनाने देने लगी है?
मैं समझना चाहता हूं कि मांस का टुकड़ा देख कर कोई कैसे पता कर सकता है कि कौन-सा मांस किसका है? एक बात और दिमाग में आती है, जो अपने को विशुद्ध शाकाहारी मानते हैं, वे क्या पके हुए साग को देख कर बता सकते हैं कि कौन पालक है, बथुआ है, सरसों है, लाफा है, पटुआ या पोय है? जब तक खाएंगे नहीं, जब तक सबका अलग-अलग स्वाद पता नहीं होगा. कैसे पता चलेगा, है न!
आजकल वेज कबाब का खूब चलन है. हमारे सामने कटहल, लौकी, मांस का कबाब रखा है. बिना खाये, शक्ल देख कर कौन ‘बहादुर’ बता सकता है कि कौन-सा कबाब किसका है? बिहार में होली पर बतिया कटहल की सब्जी खास व्यंजन है. उसकी तारीफ में कहा जाता है कि एकदम मांस जैसा बना है.
क्योंकि, उसमें मसाला वैसा डाला जाता, शोरबा वैसा ही बनाया जाता है और सबसे बढ़ कर मांस की तरह कटहल में भी रेशे होते हैं. अब अगर कोई टिफिन खोले और किसी को कटहल की सब्जी मांस का टुकड़ा लग जाये तो क्या होगा?मैं सोच रहा हूं, कहीं मेरे दिमाग में डर के घर का दायरा बढ़ता तो नहीं जा रहा!
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




