यह सत्ता विरोधी लहर का संकेत नहीं

।। संजय कुमार।। (राजनीतिक विश्लेषक एवं सीएसडीएस में प्रोफेसर) पिछले एक दशक में विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान मतदान का प्रतिशत आम तौर पर बढ़ा है. पिछले दिनों चार राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली- में हुए विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने को भी इसी ट्रेंड की अगली कड़ी के रूप […]
।। संजय कुमार।।
(राजनीतिक विश्लेषक एवं सीएसडीएस में प्रोफेसर)
पिछले एक दशक में विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान मतदान का प्रतिशत आम तौर पर बढ़ा है. पिछले दिनों चार राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली- में हुए विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने को भी इसी ट्रेंड की अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए. जिन पांच राज्यों में पिछले दिनों विधानसभा चुनावों के लिए मतदान हुए हैं, उनमें केवल मिजोरम में मतदान एक प्रतिशत घटा (2008 में 82.2 फीसदी की तुलना में 2013 में 81.2 प्रतिशत) है. चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में इस बार के चुनावों में मतदान प्रतिशत छत्तीसगढ़ में करीब चार प्रतिशत, मध्य प्रदेश में करीब तीन प्रतिशत, राजस्थान में करीब नौ प्रतिशत और दिल्ली में करीब दस प्रतिशत बढ़ा है. इससे पहले हाल के वर्षो में 24 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में से 19 राज्यों में मतदान का प्रतिशत बढ़ा था. हालांकि छत्तीसगढ़ में 2003 की तुलना में 2008 में मतदान प्रतिशत कुछ घटा था. इसी प्रकार ओड़िशा में 2004 की तुलना में 2009 में, जबकि राजस्थान में 2003 की तुलना में 2008 में मतदान प्रतिशत घटा था. झारखंड में 2005 और 2009 में हुए चुनावों में मतदान प्रतिशत में कोई खास अंतर नहीं था. इस तरह पिछले दिनों चार राज्यों में संपन्न विधानसभा चुनावों में मतदान का प्रतिशत बढ़ने को पिछले कुछ सालों से जारी मतदान प्रतिशत बढ़ने के ट्रेंड से ही जोड़ कर देखा जायेगा.
हालांकि यह सवाल हर किसी के मन में है कि न केवल इस बार के चुनावों में, बल्कि पिछले एक दशक में हुए ज्यादातर विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने के मुख्य कारण क्या हैं? क्या यह चुनाव के प्रति मतदाताओं की जागरूकता बढ़ने के कारण संभव हुआ है या मतदाताओं को प्रेरित करने में राजनीतिक दलों की सफलता का परिचायक है? सव्रे के नतीजे संकेत देते हैं कि हाल के वर्षो में चुनावों के प्रति मतदाताओं की रुचि में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है. यानी पिछले एक दशक के दौरान चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं की रुचि न तो बहुत बढ़ी है और न ही उसमें कोई उल्लेखनीय कमी आयी है. इसके बावजूद पिछले एक दशक में हम मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि देख रहे हैं. स्पष्ट है कि मतदान के बढ़े प्रतिशत को मतदाताओं में जागरूकता बढ़ने का परिचायक नहीं कहा जा सकता है. जाहिर है, इस स्थिति के बावजूद मतदान प्रतिशत बढ़ने में हम मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करने में राजनीतिक दलों की भूमिका को नकार नहीं सकते. खास कर उन सीटों पर, जहां मुकाबला कांटे का था, मतदान प्रतिशत बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि राजनीतिक दलों ने अपने समर्थकों से अधिक संख्या में मतदान कराने पर विशेष ध्यान दिया. हालांकि कुछ अन्य कारकों ने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने में अहम भूमिका निभायी है.
दूसरी बात यह भी है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि वास्तविक मतदाताओं ने अधिक संख्या में मतदान किया है. खासकर शहरी क्षेत्रों में हाल के वर्षो में मतदाता सूची का बेहतर ढंग से पुनरीक्षण हुआ है, जबकि पहले के अनुभव यह रहे हैं कि खासकर शहरी क्षेत्रों में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में फर्जी मतदाता भी शामिल होते हैं. इनमें से कुछ तो अपना मोहल्ला बदल कर उसी शहर में दूसरी जगह जा चुके होते हैं, जबकि कुछ अपना शहर भी बदल चुके होते हैं और न तो मतदाता सूची से अपना नाम कटवाते हैं और न ही पुराने शहर में जाकर वोट डालने की जहमत उठाना जरूरी नहीं मानते. जाहिर है, परिस्थितियां चाहे जो भी हों, जिस शहर में ऐसे फर्जी मतदाताओं की संख्या जितनी ज्यादा होगी, वहां मतदान का प्रतिशत उतना ही कम होगा. मतदाता सूची में गड़बड़ियों के लिए आप चुनाव आयोग पर आसानी से आरोप मढ़ सकते हैं, लेकिन यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हाल के वर्षो में आयोग ने मतदाता सूची को साफ-सुथरा और बेहतर बनाने के लिए कई कारगर प्रयास किये हैं और इसका श्रेय आयोग को दिया ही जाना चाहिए.
मतदान प्रतिशत बढ़ने का श्रेय चुनाव आयोग को इस कारण भी दिया जाना चाहिए, क्योंकि आयोग ने हाल के वर्षो में न केवल मतदान को निष्पक्ष एवं शांतिपूर्वक संपन्न कराने में काफी हद तक सफलता पायी है, बल्कि मतदाताओं को मतदान के प्रति प्रेरित करने के लिए भी कई गंभीर प्रयास किये हैं. चुनाव आयोग की कुछ नयी पहल, मसलन हाल के वर्षो में चुनाववाले राज्यों में चलाये गये ‘सिस्टमेटिक वोटर एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन’ (एसवीइइपी) कार्यक्रम, के जरिये यह पता लगाने में सुविधा हुई कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में क्या दिक्कतें आ रही हैं और विभिन्न तबकों या समूहों में कम मतदान प्रतिशत के क्या-क्या कारण हैं. आयोग की पहल केवल कारण जानने तक सीमित नहीं रही है, उसने उन कारणों को दूर करने के प्रयास भी किये हैं.
आम लोगों में यह धारणा बन गयी है कि मतदान प्रतिशत बढ़ना सत्ता विरोधी रुझान का संकेत है. हालांकि हकीकत इस आम धारणा से पूरी तरह मेल नहीं खाता. हाल के वर्षो में हुए विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने का ट्रेंड सत्ता विरोधी रुझान का कोई संकेत नहीं देता है. 2003 से 2012 के बीच 24 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें 14 राज्यों में सत्तारूढ़ दल की सत्ता में वापसी हुई है. इन 14 राज्यों में से 11 में चुनावों के दौरान मतदान का प्रतिशत बढ़ा था, सिर्फ तीन में मतदान प्रतिशत में कमी आयी थी. शेष दस में से नौ राज्यों में विधानसभा चुनावों के बाद नयी पार्टी सत्ता में आयी. इनमें से आठ राज्यों में मतदान प्रतिशत बढ़ा था, सिर्फ राजस्थान में 2003 की तुलना में 2008 में मतदान प्रतिशत में कुछ गिरावट (67.2 से घट कर 66.5 प्रतिशत) दर्ज की गयी थी. सिर्फ झारखंड के मामले में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यहां पार्टियां लगातार नये गंठबंधन बनाती रही हैं. स्पष्ट है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने को सत्ता विरोधी रुझान मानना सही नहीं होगा. इससे ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते हैं कि इन राज्यों में सत्ताधारी दल की पराजय होगी.
कुल मिला कर हाल के वर्षो में हुए विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने को भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए एक अच्छा संकेत माना जाना चाहिए, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि पहले की तुलना में अब चुनावी प्रक्रिया में मतदाताओं की भागीदारी काफी बढ़ गयी है. इसी तरह अधिक मतदान प्रतिशत से ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते हैं कि मतदाता बदलाव चाहते हैं.
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