संघर्ष के बाद बेहतर की उम्मीद

Updated at : 31 Dec 2015 5:55 AM (IST)
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संघर्ष के बाद बेहतर की उम्मीद

अनुज कुमार सिन्हा वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर देश और दुनिया की तरह बिहार, बंगाल और झारखंड (कभी ये तीनों एक ही राज्य के हिस्से थे) के लोगों का एक साल संघर्ष में बीता. मुश्किल चुनौतियों के बीच रास्ता निकालने में बीता. सारी उम्मीदें अब नये साल पर टिकी हैं. पहले बात बिहार की. देश का […]

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अनुज कुमार सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
देश और दुनिया की तरह बिहार, बंगाल और झारखंड (कभी ये तीनों एक ही राज्य के हिस्से थे) के लोगों का एक साल संघर्ष में बीता. मुश्किल चुनौतियों के बीच रास्ता निकालने में बीता. सारी उम्मीदें अब नये साल पर टिकी हैं. पहले बात बिहार की. देश का सर्वाधिक चर्चित विधानसभा चुनाव बिहार में ही हुआ. पूरे देश की निगाहें इस चुनाव पर थीं.
एक ओर भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगियों के साथ पूरी ताकत से उतरी थी, तो दूसरी ओर भाजपा के विजय-रथ को रोकने के लिए नीतीश-लालू की जोड़ी एक हो गयी थी. एनडीए को हार का सामना करना पड़ा. जैसी जीत नीतीश-लालू (साथ में कांग्रेस भी) को मिली, उसकी राजनीति के पंडितों ने कल्पना भी नहीं की थी. यूं कह लें कि पूरे साल बिहार में सारी गतिविधियां सिर्फ विधानसभा चुनाव के आस-पास घूमती रहीं.
बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार अपना दबदबा बनाये रखी, लेकिन भाजपा ने भी समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर एक वैसे राज्य में जनाधार बनाने का प्रयास जारी रखा, जहां वह काफी कमजोर रही है.
राजनीति के लिहाज से बात करें, तो झारखंड में उम्मीद ज्यादा दिखी. रघुवर दास की नयी सरकार बनी थी और लोगों को काफी उम्मीदें रहीं. इस साल झारखंड की राजनीति में कोई बड़ा तूफान नहीं आया. विपक्ष लगभग शांत रहा और राज्य सरकार को विपक्ष की ओर से किसी कड़ी चुनौती का सामना विधानसभा या उसके बाहर भी नहीं करना पड़ा.
बिहार, बंगाल और झारखंड के लिए एक अच्छी खबर यह रही कि तीनों ही राज्यों में कोई बड़ी नक्सली वारदात नहीं हुई. बंगाल इस मामले में सबसे आगे दिखा. जिस बंगाल को नक्सलवाद का कभी गढ़ माना जाता था, उस बंगाल में उसकी जड़ें लगभग खत्म हो गयी हैं. झारखंड में भी नक्सली घटनाएं कम ही घटीं. कई बड़े नक्सली नेता पकड़े गये. अब झारखंड के दूर-दराज इलाकों में वह भय नहीं दिखता है, जो दो साल पहले तक दिखाई देता था. हालांकि, बिहार में छिटपुट घटनाएं घटी हैं.
अब तीनों ही राज्यों के सामने नयी चुनौतियां हैं. बिहार में साल के अंत में जिस प्रकार दो दिनों में तीन इंजीनियरों की हत्या हुई, रंगदारी-लेवी मांगने की घटनाएं बढ़ी हैं, उसने बिहार सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है.
नये साल में बिहार सरकार के लिए बड़ी चुनौती यही रहेगी कि कैसे जनता तक यह मैसेज जाये कि नये साल में कानून-व्यवस्था का कोई संकट नहीं रहेगा, अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी. यह काम आसान नहीं होगा. बिहार के लिए नया बिहार बनाना बड़ी चुनौती होगी. बिहार, बंगाल और झारखंड में बड़े निवेश हाल में नहीं हो रहे हैं.
इससे रोजगार के अवसर तेजी से नहीं बढ़ रहे हैं. यह एक चिंता का विषय है. बिहार में बढ़ती आबादी बड़ा संकट है, जिसकी ओर फिलहाल किसी का ध्यान नहीं है. जितनी आबादी बढ़ेगी, उसी रफ्तार से अनाज का उत्पादन भी बढ़ाना होगा, और रोजगार की व्यवस्था भी करनी होगी.
रोजगार का सवाल सिर्फ बिहार के साथ नहीं है, बल्कि इसकी झारखंड में भी लोग उम्मीद लगाये बैठे हैं. राज्य का खनन उद्योग बढ़ नहीं पा रहा है. बीते दिनों दुनिया में मंदी के कारण स्टील की मांग घटी है. विदेश का स्टील भारत आ रहा है और कम कीमत पर बिक रहा है. ऐसे में झारखंड के आयरन ओर (लौह अयस्क) से जुड़े लोगों का भविष्य संकट में है.
अगर बंगाल की बात करें, तो शारदा घोटाला सर्वाधिक चर्चित रहा. कई फाइनांस कंपनियां झारखंड, बिहार और बंगाल के लाखों लोगों की गाढ़ी कमाई खा गयीं. अरबों का घोटाला हुआ. इन कंपनियों से जुड़े कुछ एजेंटों ने तो जनता के दबाव में आकर अपनी जान तक दे दी. ऐसी कंपनियों से जुड़े प्रभावशाली लोग जेल भी गये, लेकिन गरीबों का जो पैसा डूब गया, वह नहीं मिला.
ऐसे तमाम संकटों के बीच नये साल को उम्मीद भरी नजरों से देखें. उम्मीद करें कि इन राज्यों में तेजी से विकास के काम होंगे, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, समृद्धि आयेगी. पूर्वी क्षेत्र के इन तीन राज्यों को विकसित किये बगैर राष्ट्र के विकास की कल्पना करना बेकार है. यह केंद्र भी मानता है.
इसलिए नये साल में उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र बगैर किसी भेदभाव के (खास कर बिहार और बंगाल, जहां गैर-भाजपा सरकारें हैं) इन राज्यों के विकास में हर संभव मदद देगा. इन्हें विकसित करेगा. पुरानी बातों, पुराने मतभेदों को कुरेदने और ढोने से किसी का भला नहीं होनेवाला है.
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