आर्थिक मोरचे से आयी एक अच्छी खबर

Published at :04 Dec 2013 3:55 AM (IST)
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आर्थिक मोरचे से आयी एक अच्छी खबर

लंबे इंतजार के बाद अर्थव्यवस्था के मोरचे से एक राहत भरी खबर आयी है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मुताबिक इस साल की दूसरी तिमाही में यानी जुलाई से सितंबर के बीच भारत के चालू खाते के घाटे यानी आयात-निर्यात के बीच के अंतर में प्रभावी गिरावट दर्ज की गयी है. वित्त वर्ष 2013-14 की […]

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लंबे इंतजार के बाद अर्थव्यवस्था के मोरचे से एक राहत भरी खबर आयी है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मुताबिक इस साल की दूसरी तिमाही में यानी जुलाई से सितंबर के बीच भारत के चालू खाते के घाटे यानी आयात-निर्यात के बीच के अंतर में प्रभावी गिरावट दर्ज की गयी है. वित्त वर्ष 2013-14 की पहली तिमाही में जहां यह घाटा जीडीपी का 4.9 फीसदी था, दूसरी तिमाही में घट कर 1.2 फीसदी रह गया है.

मूल्य के हिसाब से पिछली तिमाही में जहां इसे 21.8 अरब डॉलर आंका गया था, वहीं इस तिमाही में यह गिर कर 5.2 अरब डॉलर रह गया. ऐसा मुख्यत: सोने के आयात में कमी लाने के लिए अपनायी गयी कठोर नीतियों की सफलता और निर्यात के जोर पकड़ने से संभव हुआ है. अमेरिका और यूरोप में आर्थिक हालात सुधरने के संकेत ने भारतीय निर्यात के लिए टॉनिक का काम किया है.

चालू खाते के घाटे में कमी का दूसरे संकेतकों पर सकारात्मक असर पड़ना तय है. इससे रुपये की कीमत को मजबूती देने के लिए रिजर्व बैंक के पास विकल्पों के नये दरवाजे खुलेंगे. रुपये के मजबूत होने से आरबीआइ अर्थव्यवस्था की सुस्त पड़ी रफ्तार में जान फूंकने के लिए ब्याज दर में कमी जैसे रास्तों पर चलने का साहस जुटा सकता है. फिलहाल अच्छी बात यह है कि अर्थव्यवस्था को लेकर पसरा निराशा का वातावरण धीरे-धीरे ही सही छंटता दिख रहा है. इससे पहले दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर के 4.8 फीसदी रहने को जानकारों ने उम्मीद से बेहतर बताया था.

पहली तिमाही में यह 4.4 फीसदी रही थी. इसने 2013-14 में जीडीपी के पांच फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीदें जगायी हैं. लेकिन, इन अच्छी खबरों को अर्थव्यवस्था में ‘सबकुछ ठीक है’ का प्रमाण मानना सही नहीं होगा. फिलहाल जो आंकड़े आ रहे हैं, वे स्वर्ण आयात को हतोत्साहित करने के कृत्रिम कदमों और अमेरिका व यूरोप की अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ने के कारण संभव हुए हैं. यह आंकड़ा कहीं से भी यह नहीं बताता कि हमारी अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक खामियां दूर हो गयी हैं. इसके लिए सुचिंतित और साहसी आर्थिक फैसलों की जरूरत होगी. चुनाव में जाने को तैयार सरकार इस कठिन रास्ते पर चल पाने का कितना साहस जुटा पाती है, यह देखना अभी शेष है.

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