महिलाओं की सुरक्षा

Updated at : 22 Dec 2015 12:41 AM (IST)
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महिलाओं की सुरक्षा

वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर 14 मिनट पर एक बलात्कार होता है. औसतन हर दो दिन पर पुलिस हिरासत में इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया जाता है. हर 13 घंटे में एक महिला अपने परिचित या करीबी के हाथों पीड़ित होती है. हर 17 घंटे में एक बलात्कार की […]

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वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर 14 मिनट पर एक बलात्कार होता है. औसतन हर दो दिन पर पुलिस हिरासत में इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया जाता है. हर 13 घंटे में एक महिला अपने परिचित या करीबी के हाथों पीड़ित होती है. हर 17 घंटे में एक बलात्कार की शिकार छह वर्ष से कम उम्र की बच्ची होती है. यौन उत्पीड़न के 31 फीसदी से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं.

तीन साल पहले देश की राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या की जघन्य घटना, जिसे देश निर्भया कांड के नाम से जानता है, के एक नाबालिग दोषी को रिहा किये जाने के मसले पर देशभर में क्षोभ, निराशा और आशंका के माहौल में एक बड़ी बहस चल रही है. इस बहस के कानूनी पक्ष पर तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से विराम लग गया है, लेकिन गंभीर अपराधों में नाबालिग दोषियों की सजा को लेकर चर्चा का एक सिरा मौजूदा कानूनों में संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में लंबित है. बलात्कार जैसे संगीन अपराधों को रोकना और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस चर्चा का दूसरा सिरा है. इन दोनों बिंदुओं पर ठहर कर विचार करने की जरूरत है.

निर्भया कांड में हुए जघन्य अपराध के दोषियों में से चार को उच्च न्यायालय ने मौत की सजा सुनायी है, जबकि एक दोषी ने हिरासत में ही आत्महत्या कर ली थी. अपराध के समय छठवें दोषी के नाबालिग होने के कारण उसे तीन साल की सजा सुनायी गयी, जो अब पूरी हो चुकी है. उसके रिहा करने को लेकर कई सवाल उठ रहे थे कि उसमें सुधार हुआ है या नहीं, उसे व्यस्क के रूप में कैद में रखा जाना चाहिए या नहीं और क्या वह पुनः ऐसे अपराध कर सकता है या नहीं. वहीं उसे रिहा करने के पक्षधरों का कहना था कि सजा का उद्देश्य सुधार है, न कि बदले की भावना, और इस अपराधी को भी सामान्य जीवन जीने का एक अवसर मिलना चाहिए. रिहाई के विरुद्ध अपील पर अंतिम सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने नागरिक-समाज की चिंताओं से सहमति जतायी, लेकिन कानून के हाथों मजबूर होने का हवाला देकर दोषी की रिहाई पर रोक लगाने से मना कर दिया.

2012 में 16 दिसंबर को हुई इस घटना ने समूचे देश को झकझोर कर रख दिया था. इसके खिलाफ उपजे जनाक्रोश के बाद बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध अन्य अपराधों को रोकने के लिए कई कानूनी कदम उठाये गये थे तथा सुरक्षा संबंधी पहल किये गये थे. इस घटना के कारण ही नाबालिग अपराधियों के बारे में मौजूदा प्रावधानों में संशोधन की मांग उठी थी. लोकसभा में संबंधित विधेयक मई महीने में पारित हो गया था, जो अब राज्यसभा के समक्ष विचाराधीन है. दुर्भाग्य से राजनीतिक खींचतान के कारण उच्च सदन में कामकाज न होने के कारण अन्य जरूरी विधेयकों के साथ यह भी लंबित है. अब समय आ गया है कि राज्यसभा प्राथमिकता के आधार पर इस पर चर्चा कर त्वरित निर्णय ले. यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि पिछले कुछ सालों से नाबालिग अपराधियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और अनेक मामलों में उनका इस्तेमाल कानून के नाजायज फायदा उठाने के इरादे से किया जाता है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, पिछले साल 48 हजार से अधिक नाबालिग विभिन्न अपराधों के लिए हिरासत में लिये गये थे. इनमें से 2144 पर बलात्कार के आरोप थे, जिनमें 1488 की उम्र 16 से 18 वर्ष थी. प्रस्तावित विधेयक में जघन्य अपराधों, यानी वे अपराध जिनमें किसी भी मौजूदा कानून में कम-से-कम सात साल की सजा निर्धारित है, के मामलों में 16 से 18 वर्ष के नाबालिगों को व्यस्क के रूप में माने जाने का प्रावधान है. वर्तमान कानून में किसी भी अपराध के लिए नाबालिग को नाबालिग के रूप में मान कर सुधार गृह में रखने की सजा दी जाती है.

बहरहाल, यह भी सोचा जाना चाहिए कि बलात्कार की रोकथाम और सजा की इस बहस का दायरा बहुत बड़ा है, जो अभी एक अपराध और अपराधी तक सीमित हो गया है. वर्ष 2014 के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर 14 मिनट पर एक बलात्कार होता है. औसतन हर दो दिन पर पुलिस हिरासत में इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया जाता है. हर 13 घंटे में एक महिला अपने परिचित या करीबी के हाथों पीड़ित होती है. हर 17 घंटे में एक बलात्कार की शिकार छह वर्ष से कम उम्र की बच्ची होती है. यौन उत्पीड़न के 31 फीसदी से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं. ऐसे भयावह आंकड़ों की सूची बहुत लंबी है. इस स्थिति को देखते हुए मानना होगा कि एक समाज और शासन-व्यवस्था के रूप में हम बुरी तरह से असफल सिद्ध हुए हैं. इसलिए तात्कालिक तौर पर हमें किसी एक मामले से ध्यान हटा कर, इस व्यापक मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और जरूरी कदम उठाने की जरूरत है.

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