बैंकिंग में पारदर्शिता

Updated at : 18 Dec 2015 11:37 PM (IST)
विज्ञापन
बैंकिंग में पारदर्शिता

बैंकों से भारी-भरकम रकम कर्ज लेकर समय पर चुकता नहीं करनेवाले लेनदारों से संबंधित सूचनाएं अब सार्वजनिक की जा सकती हैं. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सूचना के अधिकार की मजबूती और सार्वजनिक मामलों में पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) यानी बड़े उद्योगपतियों और कंपनियों के पास फंसी […]

विज्ञापन

बैंकों से भारी-भरकम रकम कर्ज लेकर समय पर चुकता नहीं करनेवाले लेनदारों से संबंधित सूचनाएं अब सार्वजनिक की जा सकती हैं. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सूचना के अधिकार की मजबूती और सार्वजनिक मामलों में पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) यानी बड़े उद्योगपतियों और कंपनियों के पास फंसी कर्ज की रकम को लेकर रिजर्व बैंक और सरकारें अक्सर चिंता जताती रही हैं.

यह रकम तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की है. देश को यह भरोसा दिया जाता रहा है कि इस धन की वसूली के प्रयास जारी हैं, लेकिन सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देने से रिजर्व बैंक मना कर देता था. कहा जाता था कि इससे देश के आर्थिक हितों का नुकसान हो सकता है और ऐसी सूचनाएं वाणिज्यिक सूचनाएं हैं. केंद्रीय सूचना आयोग ने रिजर्व बैंक की इस दलील को खारिज करते हुए उसे नाम बताने का निर्देश दिया था, लेकिन बैंक ने इसे मानने से इनकार कर दिया था.

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खरबों रुपये दबा कर बैठे धनकुबेरों के नाम सामने आ सकेंगे. लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं, आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता एक मूलभूत तत्व है. लापरवाह बैंकिंग व्यवस्था, नियम-कानूनों का दुरुपयोग और राजनीतिक संरक्षण के कारण न तो भारी कर्जों को लौटाने का दबाव पड़ता है, और न ही कोई कठोर कार्रवाई की जाती है. इतना ही नहीं, उन कर्जों को आसान शर्तों के साथ पुनर्संरचित भी कर दिया जाता है और लेनदार नये कर्ज लेने में भी कामयाब हो जाते हैं.

ऐसी रकम से होनेवाले नुकसान की भरपाई के लिए बैंकों के ब्याज दर भी बढ़ाये जाते हैं, जिसका नुकसान आम ग्राहकों को होता है.

धन की कमी के कारण बैंक जरूरी परियोजनाओं को समुचित कर्ज नहीं दे पाते हैं. कुल मिला कर, फंसी हुई रकम अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी समस्या है और इसके बारे में सूचनाएं छिपाना व्यापक देशहित में नहीं है. इस फैसले से दस साल पुराने सूचना के अधिकार कानून का दायरा बढ़ने के साथ-साथ एनपीए का मामला भी पुनः चर्चा में आ गया है.

निश्चित ही इसका दबाव लेनदार और बैंकों पर पड़ेगा. इससे बैंकों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने की मांग को भी बल मिलेगा. अगर रिजर्व बैंक स्वयं ही बीमार या गड़बड़ संस्थाओं की जानकारी सार्वजनिक कर दे, तो लोगों के ठगे जाने की संभावना भी कम होगी. डूब रहे कर्जों की वसूली की जिम्मेवारी बैंकों और सरकार की है. उम्मीद है कि इस समस्या से निपटने के लिए जल्दी ही ठोस कदम उठाये जायेंगे.

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola