मजबूत होगी सूचना के अधिकार की जंग

Published at :22 Nov 2013 2:57 AM (IST)
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मजबूत होगी सूचना के अधिकार की जंग

आरटीआइ के संबंध में कोलकाता हाईकोर्ट का ताजा फैसला आरटीआइ कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है. कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि आरटीआइ की अर्जी डालने के लिए अपनी पहचान को उजागर करना जरूरी नहीं है. अब सिर्फ पोस्टबॉक्स का नंबर देकर बिना नाम-पते के भी सूचना मांगी जा […]

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आरटीआइ के संबंध में कोलकाता हाईकोर्ट का ताजा फैसला आरटीआइ कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है. कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि आरटीआइ की अर्जी डालने के लिए अपनी पहचान को उजागर करना जरूरी नहीं है. अब सिर्फ पोस्टबॉक्स का नंबर देकर बिना नाम-पते के भी सूचना मांगी जा सकती है. सूचना के अधिकार में भारतीय लोकतंत्र को बुनियादी रूप से बदलने की क्षमता है.

यही कारण है कि सत्ता और शासन के उच्च पदों पर बैठे लोग इस बात से डरते हैं कि कहीं सूचना की क्रांति, शक्ति के संतुलन को आम जनता के पक्ष में न मोड़ दे. यही वजह है कि सूचना के अधिकार के लागू होने के बाद से ही इसके पर कतरने की कोशिशें होती रही हैं. इस डर की दूसरी अभिव्यक्ति होती है आरटीआइ कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने में. सूचना के अधिकार को लागू हुए सात साल बीत चुके हैं और बीतते हर साल के साथ सत्तातंत्र को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए आरटीआइ का इस्तेमाल एक अस्त्र के तौर पर करनेवाले लोगों पर हमले या फिर उनकी हत्या की घटनाओं में भी इजाफा होता गया है.

बीते छह सालों में तकरीबन 150 आरटीआइ कार्यकर्ता हमले का शिकार हुए हैं. कम से कम 24 लोगों को सूचना के अधिकार की जंग में अपनी जान गंवानी पड़ी है. जिन्हें सूचना से डर लगता है, वे भय का माहौल फैला कर इस अधिकार के उपयोग को रोकना चाहते हैं. एक हद तक उनका प्रयास सफल भी रहा है. 1 अरब 21 करोड़ की आबादी वाले इस देश में आज सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करनेवाले लोगों की संख्या 0.5 फीसदी से भी कम है. आरटीआइ कार्यकर्ताओं को हमले का निशाना बनाना आसान है, क्योंकि आरटीआइ के तहत अर्जी डालने वाले के लिए अपना नाम और पता देना अनिवार्य है.

अगर कोई संगठन भी इस अधिकार का उपयोग करना चाहे, तो वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि यह अर्जी किसी व्यक्ति के नाम-पते के साथ ही डाली जा सकती है. इससे उन पर ताकतवरों के हमले की आशंका बढ़ जाती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि कोर्ट के फैसले से आरटीआइ कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ेगा और सत्ता में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने की जंग और मजबूत होगी.

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