श्रीलंकाई तमिलों को न्याय कब?

Published at :21 Nov 2013 2:59 AM (IST)
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श्रीलंकाई तमिलों को न्याय कब?

।। डॉ गौरीशंकर राजहंस ।। (पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत) श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में संपन्न हुए राष्ट्रमंडल सम्मेलन में अनेक शासनाध्यक्षों और राष्ट्राध्यक्षों ने यह प्रश्न उठाया कि वहां गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद भी निदरेष तमिलों को न्याय नहीं मिल रहा है. पश्चिमी मीडिया में पिछले कई महीनों से यह खबर आ रही […]

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।। डॉ गौरीशंकर राजहंस ।।

(पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत)

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में संपन्न हुए राष्ट्रमंडल सम्मेलन में अनेक शासनाध्यक्षों और राष्ट्राध्यक्षों ने यह प्रश्न उठाया कि वहां गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद भी निदरेष तमिलों को न्याय नहीं मिल रहा है. पश्चिमी मीडिया में पिछले कई महीनों से यह खबर आ रही थी कि गृहयुद्ध की समाप्ति के अंतिम चरण में श्रीलंका की फौज ने 40 हजार निदरेष अल्पसंख्यक तमिलों को मौत के घाट उतार दिया. ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सम्मेलन में भाग लेने से पहले ही लंदन में पत्रकारों को बताया था कि वे बड़े बेमन से राष्ट्रमंडल सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका जा रहे हैं. वहां वे इस बात को अवश्य उठायेंगे कि गृहयुद्ध के अंतिम चरण में 40 हजार निर्दोष तमिलों की जो हत्या हुई है उसकी जांच एक अंतरराष्ट्रीय कमेटी के द्वारा करायी जाये. कनाडा और मॉरीशस के प्रधानमंत्रियों ने श्रीलंका में होने वाले राष्ट्रमंडल सम्मेलन का बहिष्कार यही कह कर किया था कि वहां पर 40 हजार निदरेष तमिल मारे गये और राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की सरकार ने इसकी कोई जांच नहीं करायी.

इन नेताओं की प्रतिक्रिया पर श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने कहा कि वे श्रीलंका के आंतरिक मामले में कोई विदेशी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे. उन्होंने राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों की बैठक की पूर्व संध्या पर एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है. श्रीलंका में एक पक्की कानूनी व्यवस्था है और एक मानवाधिकार आयोग है, जो इस बात की जांच करता है कि यदि किसी के साथ अन्याय हुआ है, तो दोषी को दंड दिया जाये. परंतु कहने और करने में बहुत अंतर है.

अभी हाल में संपन्न हुए ‘रीजनल कांउसिल’ के चुनाव में जब पर्यवेक्षक के रूप में प्रतिष्ठित विदेशी नागरिक वहां गये, तब उन्होंने यह रिपोर्ट दी कि श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी प्रांतों में तमिलों पर अभी भी अत्याचार हो रहे हैं. उचित तो यह था कि गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद सरकारी सेना तमिल बहुल क्षेत्रों से वापस चली जाती. परंतु सेना अभी भी वहीं डटी हुई है और अल्पसंख्यक तमिलों को तरहत्नतरह की प्रताड़ना दे रही है. अल्पसंख्यक तमिल अभी भी डरे सहमे हैं और वे श्रीलंका में द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन कर किसी तरह जी रहे हैं.

राष्ट्रमंडल सम्मेलन के शुरू में महिंदा राजपक्षे ने कहा कि 30 वर्षो तक चले गृहयुद्ध को श्रीलंका सरकार ने सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया. अब सैलानी पहले की तरह ही श्रीलंका में आ रहे हैं. देश में खुशहाली है और विकास की दर 8.2 प्रतिशत हो गयी है. परंतु, ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सम्मेलन से बाहर निकल कर कहा कि महिंदा राजपक्षे ने जो कहा, वह सही नहीं है. उचित यह है कि एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी द्वारा तमिलों पर हुए अत्याचार की निष्पक्ष जांच करायी जाये.

सम्मेलन के उद्घाटन के तुरंत बाद डेविड कैमरन तमिल बहुल क्षेत्र जाफना गये. अंगरेजों ने 1948 में श्रीलंका को आजादी दी थी. उसके बाद कैमरन पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने तमिल बहुल क्षेत्र का दौरा किया था. उन्हें पहली बार पता चला कि गृहयुद्ध में तमिल बहुल क्षेत्र में एक लाख तमिल मारे गये थे और 30 हजार तमिल अभी भी शरणार्थी कैंपों में रह रहे हैं. यह स्थिति अत्यंत दयनीय है. जिन तमिल परिवारों के सदस्य मारे गये थे, उन्होंने रोकर अपने परिवार के सदस्यों की तसवीर उन्हें दिखायी और उनसे आग्रह किया कि वे श्रीलंका सरकार पर दबाव डालें, जिससे उनका जल्दी से पुनर्वास हो सके. कैमरन ने उनसे वायदा किया है कि वे ब्रिटेन लौट कर विश्व जनमत को इस बारे में पूरी जानकारी देंगे और प्रयास करेंगे कि श्रीलंका के तमिलों के साथ न्याय हो. यह जान कर राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने घुमात्नफिरा कर कहा कि यदि पश्चिम के देश इराक की तरह श्रीलंका में हस्तक्षेप करना चाहेंगे, तो वह श्रीलंका की सरकार कभी बर्दाश्त नहीं करेगी.

यह कहना कठिन है कि राजपक्षे और उनकी सरकार और सेना के हस्तक्षेप के कारण अल्पसंख्यक तमिलों को भविष्य में न्याय मिल पायेगा. एक बात मान लेनी चाहिए कि हाल के वर्षो में श्रीलंका चीन के बहुत निकट आ गया है. चीन ने श्रीलंका के क्षतिग्रस्त क्षेत्रों में मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर स्थापित कर दी है. राजपक्षे दिन-रात चीन की तारीफ करते रहते हैं. ऐसे में यदि ब्रिटेन या पश्चिमी देशों ने सुरक्षा परिषद के द्वारा मानवाधिकार के मामले को लेकर कोई जांच बिठाने का प्रयास किया, तो चीन इसका विरोध करेगा. दूरत्नदूर तक इस बात की संभावना दिखाई नहीं पड़ती कि श्रीलंका के अल्पसंख्यकों को निकट भविष्य में न्याय मिल पायेगा और वे एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी पायेंगे.

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