कभी उनसे बात करके तो देखिए

शहर के एक प्रतिष्ठित वृद्धाश्रम के सामने गाड़ी रुकती है. कमरे की खिड़कियां खुलने लगती हैं और उनमें से झांकती हैं उत्सुक आंखें. कई वृद्ध तो अपनी कौतुहलता छिपा नहीं पाये और धमधमा कर रिसेप्शन पर पहुंच गये. लंबे-नाटे, गोरे-काले, कोई बढ़ी दाढ़ी में, कोई बेतरतीब उलझे बालों में. किसी की झुर्रियां उसके अनुभव को […]
शहर के एक प्रतिष्ठित वृद्धाश्रम के सामने गाड़ी रुकती है. कमरे की खिड़कियां खुलने लगती हैं और उनमें से झांकती हैं उत्सुक आंखें. कई वृद्ध तो अपनी कौतुहलता छिपा नहीं पाये और धमधमा कर रिसेप्शन पर पहुंच गये. लंबे-नाटे, गोरे-काले, कोई बढ़ी दाढ़ी में, कोई बेतरतीब उलझे बालों में. किसी की झुर्रियां उसके अनुभव को व्यक्त कर रही थीं, तो किसी की स्याह आंखें चश्मे के पीछे से झांक रही थीं. हर चेहरे पर किसी की तलाश में गुजरे वक्त की निशानियां थीं.
मैंने रिसेप्शन पर अमुक तारीख को भंडारा देने की बात रखी. अवसर था, पिता की तेरहवीं पर श्राद्ध भोज. जब तक रिसेप्शन वाले अपनी बात रखते, एक वृद्ध ने कहा कि वह पूड़ी खाना चाहते हैं, तो दूसरे ने रसगुल्ले खाने की बात कही. मैनेजमेंट के कर्मचारी उन्हें चुप करा कर अपने कमरों में जाने की हिदायत देने लगे. कुछेक को तो बकायदा ठेलना पड़ा. बड़ा अफसोस हुआ कि अपने घरों में बाप-दादा का फर्ज निभानेवाले ये वृद्ध अपनी पसंद का भोजन खाने को तरस गये थे. व्यवस्थापक ने बताया कि पहले हम भंडारा देनेवालों से वृद्धों की पसंद के भोजन को पूरा करवा देते थे, पर अब इसकी मनाही है. दरअसल, ये मन भर खा तो लेते हैं, लेकिन बीमार पड़ जाते हैं. इसलिए अब केवल रोटियां और कम तेल-मसालों वाली एक-दो सब्जियां ही दी जाती हैं.
व्यवस्थापक ने हॉस्टल दिखाया. बड़े करीने से सजा हुआ था हरेक कमरा. सफाई के साथ-साथ समय-समय पर दूध-जूस आदि भी दिया जाता था. बड़े कॉरपोरेट घरानों और सेठ-साहूकारों के दान पर चल रहा यह वृद्धाश्रम छोटे बच्चों के एक स्कूल के बड़े अहाते में स्थित है. दूर से ही बड़ी आत्मीयता के साथ ये वृद्ध बच्चों को खेलते हुए देखते रहते हैं.
हमारे देश में वृद्धों को आश्रम में छोड़ने की प्रथा को गलत माना जाता है. लेकिन, अनेक वृद्धों से बात कर मैंने जाना कि कई बार मजबूरियां कर्म से बड़ी हो जाती हैं. जैसे, एक वृद्ध का भरा-पूरा परिवार एक सड़क दुर्घटना में मारा गया, सो उन्हें यहां पहुंचा दिया गया. एक और अस्सी साल के वृद्ध ने बताया कि उनके दोनों बच्चे विकलांग हैं और वे अलग-अलग विकलांग स्कूलों में रह रहे हैं. पत्नी की मृत्यु के बाद यहीं आना उनका सहारा बना. घर की असहनीय हालत में एक बुजुर्ग स्वेच्छा से यहां आ गये कि कोई तो शांतिप्रिय ठिकाना मिले!
एक रिटायर्ड प्रोफेसर साहब के बच्चे विदेश में सेटल हो गये. वे उन्हें अपने साथ ले जाना चाहते थे, पर प्रोफेसर अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहते थे. अकेले घर में रहते हुए उन्होंने राजनीतिशास्त्र की कई पुस्तकें लिखीं. मैंने कहा, फिर तो आपको अकेलापन नहीं लगता होगा. उनकी आंखों में आंसू छलक आये. कितना पढूं, कितना लिखूं, आखिर हर काम की सीमा होती है. आप जैसे लोग आते हैं, तो बात कर बहुत अच्छा लगता है. ऐसे ही मनोभाव कमोबेश सभी वृद्धों की थी. सचमुच संवाद कितनी ही समस्याओं का हल है. बेहद अकेलापन है इनमें, हम जैसे लोगों को ये बेटा या बेटी कह कर बुलाते हैं. आप भी वृद्धाश्रम में रहनेवाले इन बुजुर्गों के पास कभी-कभार जरूर जायें. इनसे बातचीत कर आपको असीम सुख की प्राप्ति होगी और उन्हें संतुष्टि.
कविता विकास
स्वतंत्र लेखिका
kavitavikas28@gmail.com
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