विरासत को सहेजने की जरूरत

Updated at : 27 Nov 2015 1:13 AM (IST)
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विरासत को सहेजने की जरूरत

भारत विविध भाषाओं, धर्मों व संस्कृतियों का सुंदर गुलदस्ता है. इसके फूलों की खुशबू सदियों से वैश्विक क्षितिज पर तैरती रही है. किसी विद्वान ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित व प्रेरित होकर कहा था, ‘भारत एक चमत्कार है’. सिंधु नदी घाटी के तट पर पुष्पित व पल्लवित विश्व की प्राचीनतम सभ्यता सदियों से दुनिया को […]

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भारत विविध भाषाओं, धर्मों व संस्कृतियों का सुंदर गुलदस्ता है. इसके फूलों की खुशबू सदियों से वैश्विक क्षितिज पर तैरती रही है. किसी विद्वान ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित व प्रेरित होकर कहा था, ‘भारत एक चमत्कार है’. सिंधु नदी घाटी के तट पर पुष्पित व पल्लवित विश्व की प्राचीनतम सभ्यता सदियों से दुनिया को आकर्षित करती रही है.

भारत की भूमि अत्यंत निराली है. यहां कबीर, रैदास, नानक जैसे महान संत और गांधी, अंबेडकर, ज्योतिबा फूले और ईश्वरचंद विद्यासागर जैसे विशिष्ट समाज सुधारकों ने जन्म लिया. दुनिया के 2.4 फीसदी क्षेत्र पर फैला यह प्रदेश प्राकृतिक भूदृश्यावलियों के साथ-साथ अपनी गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और अध्यात्म की अद्वितीयता के बल पर अपने विचारों से संपूर्ण विश्व को ऊर्जावान किया है. इस अमूल्य विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ियों की है. बीते कुछ दशकों के दौरान चंद अराजक व स्वार्थी तत्वों ने गौरवशाली भारत की एकता और अखंडता को तोड़ने की पुरजोर कोशिशें की हैं. मौजूदा समय में देश की विकास-विमुख राजनीति तथा समावेशी विकास का अभाव इसके उपज के प्रमुख कारण हो सकते हैं.

हमारे नेतागण भी सियासी लाभ के लिए सारी हदें पार कर देते हैं. वहीं, कभी-कभी नागरिकों का धैर्य भी जवाब देता िदखायी दे रहा है. संविधान द्वारा प्रदत्त मूल कर्तव्यों की सूची में यह भी शामिल है कि नागरिकों को हिंसा से दूर रहना है और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करनी है. बावजूद इसके देश में हिंसा की लहरें उठती हैं, जिससे न सिर्फ देश का माहौल असहिष्णु होता है, बल्कि हिंसक आंदोलनों की आग में करोड़ों-अरबों रुपये की संपत्ति बेवजह स्वाहा हो जाती है. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा को हमें आगे आना होगा.

Àसुधीर कुमार, राजाभीठा, गोड्डा

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