एनपीए का संकट

Updated at : 26 Nov 2015 1:33 AM (IST)
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एनपीए का संकट

वह कर्ज ही क्या, जो सूद समेत नहीं लौटे! कर्ज के सूद समेत लौटने से दो बातों की गारंटी होती है. एक तो यह कि जिस आर्थिक गतिविधि के लिए कर्ज दिया गया, वह मुनाफा कमाने में कामयाब हुई. दूसरी यह कि मूलधन के साथ सूद लौटने से कर्जदाता की पूंजी में भी कुछ इजाफा […]

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वह कर्ज ही क्या, जो सूद समेत नहीं लौटे! कर्ज के सूद समेत लौटने से दो बातों की गारंटी होती है. एक तो यह कि जिस आर्थिक गतिविधि के लिए कर्ज दिया गया, वह मुनाफा कमाने में कामयाब हुई. दूसरी यह कि मूलधन के साथ सूद लौटने से कर्जदाता की पूंजी में भी कुछ इजाफा हुआ. इन दो स्थितियों को साथ करके देखें तो कर्ज का तय अवधि पर सूद समेत लौटना भारत सरीखी तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी माना जायेगा. लेकिन, भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा होता नहीं दिख रहा, खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मामले में.

इन बैंकों की उधारी समय पर नहीं लौट रही और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर ऋण वृद्धि दर भी मंद पड़ रही है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग असेट्स यानी वह कर्ज, जिसकी वापसी निर्धारित समय के भीतर नहीं हो पायी है) इस साल मार्च में 5.2 प्रतिशत से बढ़ कर जून में 6.03 प्रतिशत हो गया. अगर इस एनपीए को राशि में दिखाएं, तो यह एक साल के भीतर 2.16 लाख करोड़ रुपये से बढ़ कर 2.67 लाख करोड़ रुपये हो चुका है. एक तो बैंकों द्वारा कर्ज के नाम पर बड़े उद्योगपतियों को दी गयी पूंजी डूब रही है, दूसरी चिंताजनक बात यह भी है कि ऋण वृद्धि दर (क्रेडिट ग्रोथ रेट) बीते फरवरी माह में अपने 18 साल के न्यूनतम स्तर (9.4 प्रतिशत) पर आ गयी थी, जो फरवरी 2014 में 14.7 प्रतिशत थी. फिलहाल ऋण वृद्धि दर करीब 10 प्रतिशत है, जबकि भारत सरीखे विकासशील देश में इसे 15 से 20 प्रतिशत होना चाहिए. कर्ज का सूद समेत नहीं लौटना और अर्थव्यवस्था के भीतर कर्ज की मांग का अपेक्षित दर से न बढ़ना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. कर्ज के रूप में दी गयी पूंजी के लौटने से ही उसका फिर से निवेश संभव है.

वित्तमंत्री ने इस गंभीर होती समस्या के प्रति बैंकों को सावधान कर एक समयानुकूल काम किया है. अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पर्याप्त स्वायत्तता के बावजूद कर्ज वसूली नहीं कर पा रहे हैं, तो निश्चित ही बड़ा दोष उनके प्रबंधन का भी है. लेकिन, एनपीए की समस्या को नीतिगत स्तर पर भी देखने की जरूरत है. भारत में किसी कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसकी संपदा की नीलामी में काफी वक्त लगता है, यह बात किंगफिशर के मामले में जाहिर हो चुकी है. यह भी नियमों में खामी का ही सबूत है कि देश की अदालतों में दिवालिया होने से संबंधित करीब 60 हजार मुकदमे चल रहे हैं. जाहिर है, इन नियमों को वक्त की जरूरत के हिसाब से दुरुस्त करना बैंकों की सेहत सुधारने के लिहाज से जरूरी हो गया है.

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