बेकाबू होती बहस

Updated at : 25 Nov 2015 7:34 AM (IST)
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बेकाबू होती बहस

देश में असहिष्णुता के माहौल पर प्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान के बयान पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चल पड़ा है. उनकी लोकप्रियता और इस मुद्दे की प्रासंगिकता के मद्देनजर यह स्वाभाविक भी है. दिल्ली में एक कार्यक्रम में आमिर खान ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि ‘पिछले कुछ महीनों से सामाजिक सद्भाव को […]

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देश में असहिष्णुता के माहौल पर प्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान के बयान पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चल पड़ा है. उनकी लोकप्रियता और इस मुद्दे की प्रासंगिकता के मद्देनजर यह स्वाभाविक भी है. दिल्ली में एक कार्यक्रम में आमिर खान ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि ‘पिछले कुछ महीनों से सामाजिक सद्भाव को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं और उनके बच्चे के भविष्य को लेकर आशंकित उनकी पत्नी किरण राव ने देश से बाहर जाने को लेकर चर्चा की थी.

रोजाना अखबार खोलते हुए भी उन्हें डर लगता है.’ आमिर खान एक नामी शख्सीयत हैं. देश-विदेश में उनके करोड़ों प्रशंसक हैं. आम लोगों और मीडिया का ध्यान उन पर हमेशा रहता है. ऐसे में उन्हें या उनकी जैसी अन्य शख्सीयतों को इस तरह की कोई भी चिंता जाहिर करते समय शब्दों और भावों को बहुत सावधानी के साथ अभिव्यक्त करना चाहिए. एक छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है, जिससे मुद्दे की गंभीरता को भी नुकसान हो सकता है. यह सर्वविदित है कि लोगों के घरों में कई तरह की निजी चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन ऐसी बातों का लोग सार्वजनिक मंचों पर जिक्र नहीं करते. इतना ही नहीं, जिन लोगों के पास संसाधन और अवसर उपलब्ध हैं, वे विदेशों में जाकर बसते भी रहे हैं, लेकिन ऐसे लोग भी देश छोड़ने के मुद्दे पर कभी सार्वजनिक बयान नहीं देते.

यह भी गौरतलब है कि सहिष्णुता और सद्भाव के पक्षधरों और उन्हें बिगाड़ने पर आमादा तत्वों के बीच जब भी कोई बहस जोर पकड़ती है, तब नकारात्मक पक्ष की आक्रामता बढ़ जाती है और ऐसी हालत में सहिष्णुता के आकांक्षी लोग स्वयं को एक असहज स्थिति में पाते हैं. आमिर खान के बयान के बाद भी ऐसा ही माहौल बना हुआ है. अच्छा होता अगर बहस उन शंकाओं और चिंताओं के निवारण की दिशा में होतीं, जो सामाजिक ताने-बाने में तनाव से उपजती हैं तथा जो देश के विकास और समृद्धि की राह में बाधा हैं.

एक तो ऐसा नहीं हो रहा है और ऊपर से देश के नागरिकों की अन्य जरूरी मुश्किलों, जैसे- महंगाई, बेरोजगारी, अन्याय आदि- से भी ध्यान भटक गया है. बहुत सोच-समझकर अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करना ही एक सचेत समाज की कसौटी है. उम्मीद तो यह है कि नेता-मंत्री, बुद्धिजीवी-कलाकार सहित तमाम लोग नकारात्मक बहस को हवा देने की बजाय, अमन-चैन का वातावरण बनाने की दिशा में सकारात्मक पहल करेंगे और देश के विकास की राह को आसान बनाएंगे.

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