साइबर सुरक्षा जरूरी

Updated at : 24 Nov 2015 1:17 AM (IST)
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साइबर सुरक्षा जरूरी

हाल के दशकों में सूचना तकनीक का इस्तेमाल पूरी दुनिया में और हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ा है. स्थिति यह है कि अब डिजिटल तकनीक के ज्ञान के बिना सुरक्षा और आर्थिक तरक्की की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन, एक ओर डिजिटल और साइबर ज्ञान मानव जीवन में बेहतरी के महत्वपूर्ण उपकरण बन […]

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हाल के दशकों में सूचना तकनीक का इस्तेमाल पूरी दुनिया में और हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ा है. स्थिति यह है कि अब डिजिटल तकनीक के ज्ञान के बिना सुरक्षा और आर्थिक तरक्की की कल्पना नहीं की जा सकती. लेकिन, एक ओर डिजिटल और साइबर ज्ञान मानव जीवन में बेहतरी के महत्वपूर्ण उपकरण बन रहे हैं, तो दूसरी ओर आतंकवाद और सामरिक शत्रुता के लिए भी इनका खूब उपयोग हो रहा है. इससे बढ़ते खतरों के बीच रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने उचित ही रेखांकित किया है कि भविष्य के युद्ध साइबर परिवेश में हो सकते हैं.

खूंखार आतंकी संगठन इसलामिक स्टेट ने अपनी गतिविधियों के संचालन के साथ दुनियाभर से लड़ाकों को भर्ती करने और विध्वंसक विचारधारा के प्रचार के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया है. विभिन्न देशों के सैन्य एवं वित्तीय ठिकानों पर साइबर हमलों के भी अनेक उदाहरण हैं. भारत समेत दुनिया के अनेक देश ऐसे हमले भुगत चुके हैं और अपनी व्यवस्था को चाक-चौबंद करने की कोशिश में लगे हैं. लेकिन, डिजिटल तकनीक का संजाल किसी एक देश की सीमा में बंधा नहीं है. इसके वैश्विक प्रसार को देखते हुए साइबर हमले के मुकाबले के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना वक्त की जरूरत है. इस लिहाज से यह महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री मोदी के मलयेशिया दौरे में अन्य समझौतों के साथ साइबर सुरक्षा में परस्पर सहयोग के मसौदे पर भी हस्ताक्षर हुए हैं.

कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की चीन यात्रा में आतंकवाद से जुड़ीं गोपनीय सूचनाओं के परस्पर आदान-प्रदान पर जो सहमति बनी है, उसमें साइबर सुरक्षा भी शामिल है. ऐसे हमलों से निपटने के लिए भारत अन्य कई देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश में है, जिनमें अमेरिका, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा आदि शामिल हैं. वैश्विक ग्राम बन रही दुनिया के लिए सूचना तकनीक शरीर की धमनियों की तरह है, जिनकी सिराएं आपस में जुड़ी हुई हैं. अगर अरब, अफ्रीका और यूरोप के देश आतंक और अन्य जटिल अपराधों से त्रस्त हैं, तो भारत समेत एशिया के देशों को भी इन खतरों से जूझना पड़ता है.

जाहिर है, आइएस के आतंक और सरकारी व व्यापारिक ठिकानों पर साइबर हमलों की आशंका के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर अमेरिका, यूरोपीय देश, रूस और चीन, सही मायनों में गंभीर हैं, तो उन्हें भारत की चिंताओं को भी तरजीह देनी होगी तथा उसे साथ लेकर चलना होगा. व्यापक सहयोग और रणनीति के अभाव से हमलावरों के हौसले बुलंद होंगे, जिसकी भयावह परिणति से मानवता को जूझना पड़ सकता है.

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