नो शॉपिंग विदाउट बारगेनिंग!

Updated at : 23 Nov 2015 1:12 AM (IST)
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नो शॉपिंग विदाउट बारगेनिंग!

चप्पल वाली गली. दोनों तरफ सैंडिल-चप्पल की गुमटियों की दूर तक लंबी कतारें. भीड़ इतनी कि तिल रखने की जगह नहीं. मेमसाब एक गुमटी पर रुकीं. दर्जन भर सैंडिल निकलवायीं. पसंद नहीं आयी. अगली गुमटी. तीसरी और चौथी भी. वही नाक सिकोड़ी. पसंद नहीं. और अब दसवीं गुमटी. मुन्ना चप्पल भंडार. बंदा पस्त हो चुका […]

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चप्पल वाली गली. दोनों तरफ सैंडिल-चप्पल की गुमटियों की दूर तक लंबी कतारें. भीड़ इतनी कि तिल रखने की जगह नहीं. मेमसाब एक गुमटी पर रुकीं. दर्जन भर सैंडिल निकलवायीं. पसंद नहीं आयी. अगली गुमटी. तीसरी और चौथी भी. वही नाक सिकोड़ी. पसंद नहीं. और अब दसवीं गुमटी. मुन्ना चप्पल भंडार. बंदा पस्त हो चुका है. लेकिन मेमसाब के चेहरे पर दूर-दूर थकान का चिह्न तक नहीं.

शुक्र है, यहां मेमसाब को सैंडिल पसंद आ गयी. पेंच फंसा दाम पर. मुन्ना बोला, सौ. टंच माल. पांच साल की गारंटी मुफ्त में. मेमसाब ने बीस का दाम लगाया. मुन्ना बुरी तरह झल्ला गया. वाह, बहिन जी वाह! आधा घंटा खराब किया और अब माल की बेइज्जती कर रही हैं? चलिए आगे बढ़िए. दूसरी दुकान देखिए. बंदे को गुस्सा आया. नालायक. लेडीज से ऐसे बात की जाती है? लेकिन मेमसाब ने हाथ पकड़ लिया. जाने दीजिए. अभी ये खुद ही खुशामद करेगा.

सचमुच दो कदम आगे बढ़े ही थे कि पीछे से मुन्ना की आवाज आयी. अरे बहिन जी, आप तो नाराज हो गयीं. चलिए अस्सी दीजिए. मेमसाब वापस पलटीं. नहीं अभी ज्यादा है. मुन्ना को मालूम है लेडीज से कैसे डील किया जाये. अरे आप कोई नयी तो हैं नहीं. कभी प्रॉफिट लिया आपसे? भाई समझ कर दो पैसे पेट भरने के लिए जरूर लूंगा.

अब बात रिश्तेदारी पर आ गयी. मेमसाब को इस पर ऐतराज नहीं. नहीं भैया चालीस से ज्यादा तो एक धेला भी नहीं. मुन्ना ने हथियार डाल दिये. अच्छा चलिए छोड़िए. न मेरी न आपकी. पचास दीजिए. घर का मामला है. उसने सैंडिल पैक कर दी. मेमसाब न पसीजी. चालीस पकड़ाए और चल दीं. मुन्ना कुछ न बोला. उसे मालूम है कि चालीस से ज्यादा एक छदाम नहीं मिलेगा. लेकिन बहस की औपचारिकता तो निभानी थी. वह गर्दन झटक कर दूसरे ग्राहक से निपटने लगा.

मेमसाब खुश. मगर घंटा भर तो खराब हो गया. पंद्रह दिन गुजरे. सैंडिल नमस्कार कर गये. मेमसाब को गुस्सा आया. फिर चलो बाजार. यह कोई नयी बात नहीं है. झल्लाया बंदा एक जगह खड़ा हो गया. एक घंटे बाद यहीं मिलेंगे. मगर मेमसाब दो घंटे में लौटेंगी. उसे विश्वास है पति छोड़ कर भागेगा नहीं. बंदे के एक तजुर्बेकार दुकानदार मित्र ने राज की बात बतायी. दुकानदार ग्राहक का चेहरा देख कर समझ जाते हैं कि यह कितना मार्जिन खायेगा. पहले से ही ज्यादा रेट बताते हैं. लेकिन कभी-कभी ग्राहक जिद्दिया जाता है. घाटा सह लेते हैं. ग्राहक को जाने नहीं देंगे. अगली बार सही.

बंदे का भी अपना तजुर्बा है. आइटम और पैसे की रेंज पहले से तय कर लेता है. ज्यादा से ज्यादा पांच मिनट और आइटम पैक. दुकानदार को पैसा पकड़ाया. उसका टाइम वेस्ट नहीं किया. दुकानदार पहचानता है. हरदम यहीं तो आते हैं. उसने दस परसेंट डिस्काउंट कर दिया.

नतीजा, बंदा बिना झिक-झिक किये जो आइटम डेढ़ सौ का लाता है, मेमसाब घंटा मगज मार कर दो सौ में लाती हैं. बंदा जूता भी फिक्स्ड रेट वाली शॉप से लेता है. नो बारगेनिंग. और मेमसाब को ऐसी शॉप इसीलिए पसंद नहीं हैं. ये तेरी-मेरी कहानी है.

वीर विनोद छाबड़ा

वरिष्ठ व्यंग्यकार

chhabravirvinod@gmail.com

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