बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे

Updated at : 21 Nov 2015 1:00 AM (IST)
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बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे

सिमरिया का कार्तिक मास मेला इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थ जन यहां फूस की छोटी-छोटी झोपड़ियों में मास भर सपत्नीक रह कर सात्विक जीवन जीते हुए ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा पूरी कर सकते हैं. कहां बदरीनाथ की वायुवेग से दौड़नेवाली अलकनंदा और कहां सिमरियाघाट की मंथर गति से बहनेवाली गजगामिनी गंगा! मगर देवोत्थान एकादशी […]

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सिमरिया का कार्तिक मास मेला इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थ जन यहां फूस की छोटी-छोटी झोपड़ियों में मास भर सपत्नीक रह कर सात्विक जीवन जीते हुए ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा पूरी कर सकते हैं.
कहां बदरीनाथ की वायुवेग से दौड़नेवाली अलकनंदा और कहां सिमरियाघाट की मंथर गति से बहनेवाली गजगामिनी गंगा! मगर देवोत्थान एकादशी की पूर्व संध्या पर मुझे गंगा का यह शांत-स्निग्ध रूप ज्यादा आकृष्ट कर रहा है, क्योंकि इसकी धारा में केवल जल नहीं, मेरे गांव की मिट्टी, वनस्पति और पूर्वजों की स्मृतियां प्रवाहित हैं. मेरे गांव के अधिकतर बूढ़-पुरनियों के शव का दाह-संस्कार इसी सिमरियाघाट पर होता है. सब लोग इतने बड़भागी नहीं हैं कि उनके पुत्र-पौत्र बदरीनाथ के ब्रह्म कपाल स्थान पर जाकर पिंडदान-तर्पण कर उन्हें मुक्ति दिला सकें. इसलिए उन असहाय लोगों की आत्मा को तारने के लिए त्रिभुवन तारिणी गंगा सिमरिया में ही बहती हैं.
सिमरिया घाट के दिव्य शक्तिपीठ काली धाम सिद्धाश्रम से पश्चिम में डूब रहे सूर्य की लाल किरणों में रंजित गंगा की मटमैली जलधारा मुझे फटी-पुरानी साड़ी पहने किसी देहाती मां सी लगती है, जो शाम के समय अपने सर पर खर-पात, कांट-कुश आदि लादे किसी अज्ञात दिशा की ओर बहे चली जा रही है. बदरीनाथ की उछलती-कूदती तरुणी अलकनंदा जिंदगी के तमाम टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरती हुई यहां आकर बूढ़ी मां बन जाती है. यदि वह वत्सल मां नहीं होती, तो कैसे अपने थके-हारे कवि-पुत्र विद्यापति की पुकार सुन कर अपनी राह छोड़ कर उत्तर की ओर बढ़ जातीं?
गंगा जहां-जहां उत्तरवाहिनी हुई हैं, वहां-वहां उनका माहात्म्य बढ़ा है; चाहे वह वाराणसी हो या विद्यापतिनगर. वह स्थान सिमरिया के पास ही है, जहां महाकवि विद्यापति ने आर्त होकर गंगा मां का स्तवन इन शब्दों में किया था :
बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे।
छाड़इत निकट नयन बह नीरे।।
क्या ही संयोग है कि जिस स्थान पर महाकवि विद्यापति ने देहोत्सर्ग किया था, उसी के पास कई सदियों बाद राष्ट्रकवि दिनकर उत्पन्न हुए. लगा कि गीता का वाक्य ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय’ यहां आकर सार्थक हो गया.
सिमरियाघाट का कार्तिक मास प्रयाग घाट के माघ मास से कम लोकप्रिय नहीं है. माना कि उतना बड़ा आंगन सिमरिया के पास नहीं है, मगर इससे क्या? जिसके पास सामर्थ्य नहीं होता, क्या उसकी आस्था कमतर होती है? यह आस्था तो शालिग्राम की है. छोटा-बड़ा यहां कोई नहीं होता. घाट के पास एक मास के लिए बसे आस्था के इस गांव में गरीब भी उसी ठाठ से रहते हैं, जिस ठाठ से अमीर लोग रहते हैं.
जिन दिनों पूरे मिथिलांचल ही नहीं, संपूर्ण भारत में मैथिली संस्थाओं द्वारा दीपावली और भ्रातृ द्वितीया पर्व की भांति विद्यापति पर्व मनाया जाता है, लगभग उन्हीं दिनों इस सिद्धाश्रम के सूत्रात्मा स्वामी चिदात्मन वेद-वेदांग संबंधी विषयों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी रखते हैं- बिना किसी सरकारी सहायता के और बिना किसी धनाढ्य व्यक्ति के सहयोग के. स्वामी जी की सादगी और पारदर्शी व्यक्तित्व के कारण देश के कोने-कोने से अधिकारी विद्वान इस संगोष्ठी में भाग लेते हैं, जिसका लाभ जिज्ञासु स्नानार्थी उठाते हैं. स्वामी चिदात्मन जी के प्रयास से ही सिमरिया में कुंभ लगना शुरू हुआ है. अगला कुंभ 2017 में लगेगा, जिसकी तैयारी अभी से शुरू हो गयी है.
बिहार जिस तरह पिछले वर्षों जातिगत वैमनस्य से आक्रांत हुआ है, उसमें इस प्रकार के मेल-मिलाप के आयोजन संजीवनी का काम करते हैं. स्वामीजी के आयोजन में भाग लेनेवाले कार्यकर्ता सभी जाति-धर्म के होते हैं. सभी साथ-साथ काम करते हैं, साथ-साथ भोजन भी करते हैं, सामान्य अतिथियों के साथ. यह बड़ी बात है. कई दशकों से मिथिलांचल के गांव उद्यमी पुरुषों के पलायन से त्रस्त हैं. गांवों में या तो वे ही बुजुर्ग रहते हैं, जिन्हें अपने परिवेश में जिस किसी भी तरह जीने की आदत पड़ गयी है, या वे माताएं और उनकी संतानें, जिनकी नाव का खेवनिहार शहर में किसी तरह मजूरी करके दो पैसा बचा कर अपने परिवार को भेजता है. गांवों में श्रमिक अब नहीं मिलते. मनरेगा ने बचे-खुचे श्रमिकों को भी घर बैठा दिया. इसलिए इस समय प्रत्येक गांव एक अघोषित वृद्धाश्रम में तब्दील हो गया है. ऐसे में सिमरियाघाट के इस सिद्धाश्रम का क्षेत्र के अपने बहुमूल्य जीवन-दर्शन को बचाने का प्रयास मायने रखता है.
वैदिक धर्म, उसकी उपासना-पद्धति, यज्ञ-याजन आदि के संरक्षण में मिथिला के विद्वानों ने जो त्यागमय भूमिका निभायी, वह तो महत्वपूर्ण है ही, गृहस्थ धर्म को संन्यास से भी अधिक गुरुत्व भी मिथिला ने ही दिया. विदेह राजा जनक के अलावा वैदिक ऋषि गौतम और याज्ञवल्क्य अपने गृहस्थाश्रम को ही गुरुकुल एवं साधना-केंद्र बनाया था, जो परंपरा पिछली सदी तक जीवित रही. आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के विचार यहीं पृथक हो जाते हैं. शंकराचार्य का मत था कि मोक्ष के लिए साधक को गृह त्याग कर संन्यास ले लेना चाहिए- निजगृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्. वे वेदांत साधना में गृहस्थाश्रम को बाधक मानते थे और स्वयं बाल्यावस्था से ही संन्यस्त रहे, लेकिन आचार्य मंडन ने गृहस्थ जीवन को मानव जीवन का मेरुदंड माना और इसी के माध्यम से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग दिखाया.
बहरहाल, सिमरिया का कार्तिक मास मेला इस बात का प्रमाण है कि गृहस्थ जन यहां फूस की छोटी-छोटी झोपड़ियों में मास भर सपत्नीक रह कर सात्विक जीवन जीते हुए ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा पूरी कर सकते हैं.
बुिद्धनाथ िमश्रा
वरिष्ठ सािहत्यकार
buddhinathji@gmail.com
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