कर्म के बजाय शब्द का वर्चस्व!

Updated at : 20 Nov 2015 1:29 AM (IST)
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कर्म के बजाय शब्द का वर्चस्व!

राजनीतिक विवाद पैदा करनेवाले बयान तो एक हद तक चल जाते हैं, लेकिन घृणा फैलाते बयानों को सामाजिक-सांस्कृतिक अंतर्विरोधों से भरे हमारे समाज में मंजूरी नहीं दी जा सकती. बीते कुछ समय से ऐसे बयानों में तेजी आयी है. किसी एक बयान पर कभी-कभी तूफान मच जाता है. कुछ लोग विवादास्पद बयान देते ही इसलिए […]

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राजनीतिक विवाद पैदा करनेवाले बयान तो एक हद तक चल जाते हैं, लेकिन घृणा फैलाते बयानों को सामाजिक-सांस्कृतिक अंतर्विरोधों से भरे हमारे समाज में मंजूरी नहीं दी जा सकती. बीते कुछ समय से ऐसे बयानों में तेजी आयी है.
किसी एक बयान पर कभी-कभी तूफान मच जाता है. कुछ लोग विवादास्पद बयान देते ही इसलिए हैं कि तूफान मचे. इससे उन्हें सुर्खियां मिलती हैं. राजनीति में दबदबा बढ़ता है. इन दिनों बयानों से विवाद, घृणा या टकराव पैदा करने की होड़ सी मची है. अखबारों-चैनलों पर सरसरी नजर डालिए, तो बहुत संभव है, खबरों से ज्यादा आपको नेताओं के किसिम-किसिम बयान मिलें. बीते कुछ बरसों से अंगरेजी के कुछेक अखबारों ने नेताओं के बेवजह के बयान छापने बंद या कम कर दिये हैं, पर ज्यादातर अखबारों-चैनलों में यह सिलसिला जारी है. इस बयान-संस्कृति का दूसरा पहलू चिंताजनक है. इससे काम की संस्कृति को गहरा धक्का लगा है. सामाजिक-राजनीतिक जीवन में कर्म के बजाय शब्द का वर्चस्व स्थापित हो रहा है.
इन दिनों कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद और केंद्रीय मंत्री वीके सिंह जैसे अनुभवी लोगों के बयान पर विवाद छिड़ा हुआ है. भाजपा के नेताओं को लगता है कि अय्यर और खुर्शीद को पाकिस्तानी मीडिया या पाकिस्तानी धरती पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ‘निम्नस्तरीय’ बयानबाजी नहीं करनी चाहिए थी. लेकिन भाजपा अपने नेता वीके सिंह के एक और विवादास्पद बयान पर खामोश है. वीके सिंह का बयान भी विदेशी धरती पर दिया गया. उन्होंने लास एंजिलिस में आयोजित ‘क्षेत्रीय प्रवासी-भारतीय दिवस’ में कहा कि ‘भारत में जो लोग कथित असहिष्णुता के बढ़ने पर बहस कर रहे हैं, उन्हें इसके लिए पैसे मिले हैं.’ अपने बयान में उन्होंने सम्मान वापस करनेवाले बड़े साहित्यकारों को लपेटा और मीडिया को भी नहीं बख्शा. दलितों, मीडिया और साहित्यकारों को वह पहले भी निशाने पर ले चुके हैं.
अय्यर और खुर्शीद के बयानों पर भाजपा की ज्यादा आपत्ति उनके विदेशी धरती पर दिये जाने को लेकर है. दोनों कांग्रेसी नेताओं के बयानों में ‘देशद्रोही तत्व’ तलाशे जा रहे हैं. निस्संदेह, अय्यर और खुर्शीद के खास स्थान या समय पर दिये बयान के औचित्य-अनौचित्य पर बहस हो सकती है. अय्यर पहले से ही अपने मोदी-विरोधी बयानों के लिए विवादों में रहे हैं. बीते लोकसभा चुनाव से पहले ‘चायवाला विषयक’ उनके विवादास्पद बयान का मोदी और भाजपा ने जम कर फायदा उठाया. अनेक कांग्रेसियों ने भी तब कहा था कि अय्यर का वह बयान भाजपा के फायदे में गया.

पाकिस्तानी चैनल- ‘दुनिया टीवी’ की एक चर्चा में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी को हटाये (‘रिमूव’) बगैर भारत-पाक के बीच शांति-वार्ता नहीं हो सकती. राजनेता से पहले अय्यर राजनयिक रहे हैं. भारत-पाक रिश्ते पर वह लगातार बोलते-लिखते रहे हैं. हो सकता है, वह शिद्दत से महसूस करते हों कि प्रधानमंत्री मोदी भारत-पाक शांति-वार्ता नहीं चाहते, दोनों देशों में टकराव की निरंतरता चाहते हैं. भाजपा को ज्यादा आपत्ति इस बात पर है कि कांग्रेस नेता का बयान पाकिस्तानी जमीन से क्यों आया? अय्यर के समर्थन में उतरे कांग्रेसियों की दलील है, ‘क्या गलत कह दिया अय्यर ने, मोदी जी तो विदेश-दौरे पर जब भी जाते हैं, देश की अंदरूनी राजनीति, विपक्षी पार्टियों और प्रतिद्वंद्वी नेताओं को बेवजह निशाना बनाते हैं! कई बार तो देश की छवि भी खराब करते हैं!’

राजनीतिक विवाद पैदा करनेवाले बयान तो एक हद तक चल जाते हैं, लेकिन घृणा फैलाते बयानों को सामाजिक-सांस्कृतिक अंतर्विरोधों से भरे हमारे समाज में मंजूरी नहीं दी जा सकती. बीते कुछ समय से ऐसे बयानों में तेजी आयी है और निस्संदेह, इस मामले में सत्ताधारी भाजपा या संघ परिवार से जुड़े नेता सबसे आगे हैं. केंद्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह, निरंजन ज्योति, वीके सिंह, महेश शर्मा, विधायक संगीत सोम, कैलाश विजयवर्गीय, साध्वी प्राची, प्रवीण तोगड़िया, साक्षी महाराज और आदित्य नाथ जैसे कई नाम हैं, जो घृणा और टकराव पैदा करनेवाले बयानों के कारण सुर्खियों में रहे. इनमें कुछेक पर मामले भी चल रहे हैं.
चिंताजनक यह है कि दलों का शीर्ष नेतृत्व अपने दल से जुड़े नेताओं के विवादास्पद बयानों पर आमतौर पर खामोश रहता है, कई बार बचाव करता नजर आता है. अगर भाजपा सांसद आदित्य नाथ या साक्षी महाराज के किसी ‘अग्निवर्षी बयान’ पर पार्टी या सरकार के बड़े नेताओं या प्रवक्ताओं से मीडिया पूछता है, तो वे उल्टे पत्रकारों से पूछने लगते हैं, ‘आप इसी तरह का सवाल आजम खान से क्यों नहीं पूछते?’ ऐसी पिलपिली दलीलें राजनीति में गैरजिम्मेदारी और असहिष्णुता को बढ़ाती हैं, किसी तरह के आत्मचिंतन की जरूरी प्रक्रिया को बाधित करती हैं. इस तरह समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जमीन तैयार होती है.
लेकिन बयान-संस्कृति का एक और पहलू है. कई बार यह भी देखा गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय या उत्पीड़ित समाज से जुड़ा कोई नेता या विचारक अगर किसी विषय पर अपनी बेबाक राय प्रकट करता है, तो उसे विवादों में घसीट लिया जाता है और उसकी सोच या आॅब्जर्वेशन पर संजीदा ढंग से विचार के बजाय तूफान मचा दिया जाता है. सवाल है, क्या हमारे समाज में अल्पसंख्यक या सबाल्टर्न मामलों पर जेनुइन ढंग से बोलनेवाले नेताओं की अनदेखी हुई है? क्या बहुसंख्यक समाज से ऐसे नेता अब कम आ रहे हैं, जो अल्पसंख्यक या अन्य उत्पीड़ित समाजों के लिये खुलकर बोल सकें? सत्ता और राजनीति में हाशिये पर फेंके जाने के डर से कई समझदार राजनेता भी नाजुक मसलों पर बोलने से बचते हैं. आज के माहौल में अपने को असुरक्षित महसूस करते लोगों के पक्ष में बोलनेवालों का अकाल सा है. क्या गांधी की विरासत नहीं बचेगी?
अंत में दो शब्द मीडिया पर. क्या मीडिया अपने लिए कोई आचार संहिता नहीं बना सकता कि वह गैरजिम्मेदाराना किस्म के लोगों के संदर्भहीन बयानों को तरजीह नहीं देगा? सांप्रदायिक मामलों में जिस पर पहले से मामले चल रहे हों, वैसे नेताओं के विवादास्पद बयान क्यों सुर्खियां बनें? जिसे धर्म या संस्कृति का मामूली ज्ञान भी न हो, उसके बयान धर्म-संस्कृति पर क्यों छापे या प्रसारित हों? इतिहास के बारे में जिसके अध्ययन का कोई इतिहास न हो, उसके अनर्गल प्रलाप पर टीवी चैनलों पर हंगामी बहस क्यों हो? क्यों न सिर्फ मंत्रियों, पार्टी प्रवक्ताओं, पदाधिकारियों या वरिष्ठ नेताओं के बयानों को ही प्रकाशन-प्रसारण के लिए चुना जाये? अगर उनके बयानों से विवाद या बहस उठती है, तो उठने दीजिए. सिर्फ सुर्खियां बटोरने, समाज में घृणा फैलाने, सियासत या संगठन में अपनी हैसियत चमकाने के मकसद से उत्तेजक बयानबाजी करनेवाले गैर-जरूरी नेताओं को मीडिया तरजीह क्यों दे?
उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
urmilesh218@gmail.com
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