किसको सहूलियत?

सरकार ने सेवा करों पर ‘स्वच्छता सेस’ का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है. ‘स्वच्छ भारत’ अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में है. पिछले साल गांधी जयंती पर इसकी शुरुआत के समय कहा गया था कि इसे एक जनांदोलन बनाया जायेगा, जिसमें हर नागरिक बतौर स्वयंसेवी शामिल होगा तथा इस संबंध में कोई आर्थिक […]
लेकिन, इस वर्ष के बजट में 0.5 फीसदी स्वच्छता सेस की घोषणा कर दी गयी, जो नीति आयोग की एक उपसमिति की संस्तुति पर 16 नवंबर से लागू भी हो गयी है. सेवा कर की मौजूदा दर 14.5 फीसदी है. इसके नतीजे में अब फोन कॉल, रेस्त्रां में खाना, मनोरंजन जैसी अनेकानेक चीजें महंगी हो गयी हैं.
देश में पहले से ही 20 तरह के सेस लागू हैं, जिनसे सरकार को भारी आय हो रही है. वर्ष 2015-16 में जो 9.20 लाख करोड़ रुपये करों के जरिये वसूले जाने हैं, उनमें 1.52 लाख करोड़ यानी 16.60 फीसदी सेसों से आने हैं. इस साल के बजट में स्वच्छता अभियान के लिए 3500 करोड़ रुपये निर्धारित हैं, जबकि सेस से इस वित्तीय वर्ष के बचे महीनों में 3800 करोड़ के अतिरिक्त आय की आशा है. उल्लेखनीय है कि साफ-सफाई की मुख्य जिम्मेवारी राज्यों और स्थानीय निकायों की है, जिसके लिए राज्यों और नगरपालिकाओं में बजट निर्धारित हैं. सेस की आय का आवंटन उन्हें नहीं किया जायेगा. राज्यों ने ऐसे सेसों का हमेशा विरोध किया है. सीएजी ने भी इन्हें अपारदर्शी कहा है और इनके उपयोग पर सवाल उठाये हैं. नये सेसों से कर प्रणाली की जटिलता भी बढ़ती है. इसका खामियाजा गरीबों तथा निम्न मध्यवर्ग को भुगतना पड़ता है. ऐसे में सेसों की समुचित समीक्षा की जरूरत है. इस बीच सरकार ने रेल यात्रियों पर भी आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है.
करीब 2.30 करोड़ लोग रोजाना रेलों में सफर करते हैं. ऐसे में न्यूनतम किराया पांच से बढ़ा कर दस रुपये करना तथा आरक्षित टिकट रद्द कराने की दरों में दो गुनी वृद्धि बड़ी संख्या में यात्रियों को प्रभावित करेगी. रेलवे ने ट्रेन छूटने से आधा घंटा पहले तक ही टिकट रद कराने का नया नियम बना कर उन यात्रियों के लिए नयी मुसीबत खड़ी कर दी है, जो अंतिम समय में अपरिहार्य कारणों से यात्रा नहीं कर पाते हैं. इन निर्णयों के साथ पिछले दिनों पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी वृद्धि हुई है. दूसरी ओर देश में साफ-सफाई या आम यात्रियों के लिए रेल सुविधाओं में बड़ा परिवर्तन दिखना अभी बाकी है. ऐसे में यह सवाल जायज है कि सरकार जनता की जेब पर लगातार बोझ बढ़ा कर किसको सहूलियत देना चाहती है?
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