बदल रहे हैं हिंदी साहित्य में मानक!

Updated at : 19 Nov 2015 1:57 AM (IST)
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बदल रहे हैं हिंदी साहित्य में मानक!

इस साल की सबसे यादगार साहित्यिक कहानी कौन-सी है? एक मित्र लेखक के इस सवाल ने सोचने को विवश कर दिया. हिंदी में सभी भारतीय भाषाओं से अधिक लघु पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं, सबसे अधिक पुस्तकें छपती हैं, सबसे अधिक प्रकाशक इसी भाषा में हैं. लेकिन मैं एक कहानी ऐसी याद नहीं कर पाया, जिसे […]

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इस साल की सबसे यादगार साहित्यिक कहानी कौन-सी है? एक मित्र लेखक के इस सवाल ने सोचने को विवश कर दिया. हिंदी में सभी भारतीय भाषाओं से अधिक लघु पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं, सबसे अधिक पुस्तकें छपती हैं, सबसे अधिक प्रकाशक इसी भाषा में हैं. लेकिन मैं एक कहानी ऐसी याद नहीं कर पाया, जिसे हिंदी साहित्य के पारंपरिक मानकों पर यादगार कहानी कह पाऊं.

वास्तव में 2015 हिंदी साहित्य की दुनिया में एक बड़े बदलाव के लिए याद किया जायेगा. वह बदलाव है पाठकों का केंद्र में आना. इस साल हिंदी लेखन में ताजगी दिखाई दी और पाठकों ने उसका आगे बढ़ कर स्वागत किया. अभी हाल में ही मैं लोकप्रिय युवा लेखक पंकज दुबे के साथ मुजफ्फरपुर और दरभंगा जैसे शहरों में गया था. उनके उपन्यास ‘इश्कियापा’ का वहां पाठकों और सुधीजनों ने जिस तरह से स्वागत किया, वह आंखें खोल देने के लिए काफी था. पाठकों के मन में गंभीर और लोकप्रिय का विभाजन नहीं है. यह विभाजन हिंदी साहित्य के मठों-गढ़ों के बनाये हुए हैं.

आजादी के बाद हिंदी की जो तथाकथित मुख्यधारा बनी, उसमें लोकप्रिय और गंभीर को लेकर वैसा कड़ा विभाजन नहीं था. जब हिंद पॉकेट बुक्स ने एक-एक रुपये में पुस्तकें छापने और ‘घरेलू लाइब्रेरी योजना’ के माध्यम से उसे घर-घर पहुंचाने का जिम्मा उठाया, तो उसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं था. प्रकाशक की ओर से तो नहीं ही था और लेखकों की तरफ से भी नहीं था. कर्नल रंजीत और कमलेश्वर एक ही सेट में छपते थे और घर-घर पहुंचते थे.

साहित्य का मतलब गंभीर होता है, यह ट्रेंड 1980 के दशक के आखिरी वर्षों में तब शुरू हुआ, जब हिंदी का बाजार सिमटने लगा था. यह अजीब विडंबना है कि जिस दौर में साहित्य में ‘जन-जन’ का जोर बढ़ा, क्रांति की मुद्राएं बढ़ने लगीं, उसी दौर में पाठक साहित्य से कटने लगे. अगले लगभग 20 वर्षों तक हम जैसे लेखकों ने जो कहानियां लिखी, वे पाठकों के लिए नहीं, बल्कि साहित्य के शीर्ष पर बैठे मठाधीशों की नजर में आने के लिए लिखी. समाज के बदलावों को लेकर उनमें एक नकारात्मक भाव था. यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि 90 के दशक के बाद समाज में हुए व्यापक बदलावों को समझने में हमसे चूक हुई. जिस दौर में समाज सबसे तेजी से बदल रहा था, हम विचारों को बचाने में लगे थे.

इसी संदर्भ में मैं सोचता रहा कि आखिर इस साल कोई यादगार कहानी क्यों नहीं आयी. असल में हमारी सोच में फांक है. हम यादगार उसे ही मानते हैं, जो अतीत के मानकों पर खरी उतरती है. जबकि, इस साल भविष्य के मानकों को स्थापित करनेवाली रचनाएं आयीं, जिनको भविष्य में ट्रेंडसेटर कह कर याद किया जायेगा.

रही बात गंभीर साहित्य की, तो मुझे अपने प्रिय जासूसी लेखक का वह वाक्य याद आता है, जो एक शाम प्रेस क्लब में रसरंजन के बाद उन्होंने कही थी- ‘गंभीरता एक मुद्रा है, लेकिन तुम हिंदी वालों ने उसे मूल्य समझ लिया!’

प्रभात रंजन

कथाकार

prabhatranja@gmail.com

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