दीपावली में पटाखों के लाभ भी हैं

Updated at : 11 Nov 2015 4:43 AM (IST)
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दीपावली में पटाखों के लाभ भी हैं

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री दीपावली पर पटाखों से होनेवाले प्रदूषण को लेकर पर्यावरणविद् चिंतित रहते हैं. वायु इतनी प्रदूषित हो जाती है कि सांस लेना कठिन हो जाता है. निश्चित ही इस प्रदूषण का तात्कालिक प्रभाव नकारात्मक होता है. परंतु, इन ‘जहरीले’ तत्वों के कुछ लाभ भी हैं. बरसात के समय भारी मात्रा में कीड़े […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
दीपावली पर पटाखों से होनेवाले प्रदूषण को लेकर पर्यावरणविद् चिंतित रहते हैं. वायु इतनी प्रदूषित हो जाती है कि सांस लेना कठिन हो जाता है. निश्चित ही इस प्रदूषण का तात्कालिक प्रभाव नकारात्मक होता है.
परंतु, इन ‘जहरीले’ तत्वों के कुछ लाभ भी हैं. बरसात के समय भारी मात्रा में कीड़े उत्पन्न हो जाते हैं. एक दिन हवा के जहरीली हो जाने से इनकी भारी संख्या में मृत्यु हो जाती है. बुजुर्ग कहते हैं कि दीपावली का दीया देखने के बाद कीट-पतंगे गायब हो जाते हैं. हालांकि, प्रकृति में हानिकारक एवं गुणकारी दोनों प्रकार के कीटाणु होते हैं, जैसे बैरये हानिप्रद होती है और मधुमक्खी लाभप्रद होती है. अतः पटाखों से निकली जहरीली गैसों से दोनों प्रकार के कीटाणु मरते हैं. परंतु, वायुमंडल में हानिप्रद कीटाणु ज्यादा होने से कुल प्रभाव लाभप्रद रहता है.
पटाखों में कई प्रकार के तत्वों का उपयोग होता है. कुछ हानिप्रद होते हैं कुछ नहीं. सरकार को चाहिए कि हानिप्रद तत्वों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाये. पटाखों में कार्बन के स्थान पर नाइट्रोजन का उपयोग करने से धुआं कम पैदा होता है और उतने ही तत्वों के उपयोग से ज्यादा रोशनी उत्पन्न होती है.
सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र मेहरोत्रा का कहना है कि जहरीली गैसों के सम्मिश्रण का भी प्रभाव होता है. आवाज वाले पटाखों में सल्फर ज्यादा होता है, जबकि रोशनी वाले पटाखों में फास्फोरस ज्यादा होता है. पटाखों में अलग-अलग रंग लाने के लिए पोटैशियम, स्ट्रांशियम का उपयोग होता है. पटाखों से यदि इन तत्वों की मिश्रित गैस निकले, तो कीटनाशक कार्य ज्यादा अच्छी तरह होता है. यदि एक ही प्रकार के पटाखे चलाये गये और एक ही गैस निकली, तो कीटनाशक कार्य मंद पड़ जाता है. उस गैस की अधिकता से हमें ज्यादा नुकसान होता है.
इसलिए सरकार को चाहिए कि पटाखों पर तत्वों का ब्योरा छापना अनिवार्य कर दे, जिससे उपभोक्ता को पता लगे कि किस गैस का उत्सर्जन हो रहा है.
पटाखों में गंधक का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है. गंधक का फसल पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है. गांवों में मान्यता है कि पटाखे जलाने से पाला (ठंड) ज्यादा पड़ता है, जो फसलों के लिए लाभदायक है.
साथ ही पटाखों का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है. आतिशबाजी से मन प्रफुल्लित होता है. खेल समारोहों, नववर्ष उत्सव, विभिन्न त्योहारों पर भारी मात्रा में पटाखे छोड़े जाते हैं. इनसे निश्चित रूप से प्रदूषण फैलता है, लेकिन प्रदूषण से होनेवाली हानि की तुलना में मानसिक ऊर्जा में वृद्धि से लाभ बहुत ज्यादा होता है.
प्रदूषण की मात्रा पर भी ध्यान देने की जरूरत है. जैसे स्टेडियम के ऊपर भारी मात्रा में आतिशबाजी होने पर उत्सर्जित गैस वायुमंडल के विस्तार में फैल जाती है, जिससे लोगों को विशेष नुकसान नहीं होता है, जबकि आतिशबाजी से प्रफुल्लित हुए मन से लाभ अधिक होता है.
उतनी ही आतिशबाजी यदि स्टेडियम में हो, तो पूरे स्टेडियम में जहरीली गैस फैल जायेगी और दर्शकों को स्वास्थ का नुकसान होगा. इस सिद्धांत के तहत गांव में आतिशबाजी लाभप्रद होगी, जबकि शहर में हानिप्रद. इसलिए खुले मैदानों में विशेष स्थान निर्धारित कर देने चाहिए, जहां अधिक मात्रा में पटाखे जलाये जा सकते हों.
हमारी परंपरा में सरसों तेल के दीये को जलाने की विशेष प्रथा रही है. इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष है. इससे हमारे स्पाइनल कॉर्ड के निचले हिस्से पर सुप्रभाव पड़ता है. सरसों के तेल से कीटाणु भागते हैं और वायुमंडल शुद्ध होता है.
पटाखों के मनोवैज्ञानिक लाभ बहुत महत्वपूर्ण हैं. मन के प्रफुल्लित होने से सभी सांसारिक कार्य सुलभ हो जाते हैं. हमारी काबिलियत इसमें है कि पटाखों से होनेवाले मनोवैज्ञानिक एवं कीटनाशक लाभों को हासिल कर लें, परंतु अधिक प्रदूषण से होनेवाली हानि से बच निकलें.
जरूरत पटाखों को बंद करने की नहीं, बल्कि इन्हें सुदिशा देने की है. सभी पटाखों पर तत्वों एवं कार्बन उत्सर्जन के लेबल लगाना अनिवार्य बना देना चाहिए. जनता को बताना चाहिए कि मिश्रित पटाखों का उपयोग करें, जिससे विभिन्न तत्वों की गैस का उत्सर्जन हो और इनसे होनेवाले कीटनाशक लाभ हो, हम उम्दा हासिल कर सकें. हर क्षेत्र में पटाखों की उपयुक्त मात्रा को निर्धारित करना चाहिए.
अधिक पटाखे जलाने के लिए खुले मैदान में अलग स्थान बना देना चाहिए. ग्रीन पटाखों के उत्पादन की पहल करनी चाहिए. बिजली की लड़ियों के स्थान पर सरसों के दीये को जलाने की परंपरा को फिर से कायम करनी चाहिए.
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