दीपावली बन कर जग का तम दूर करो

Updated at : 11 Nov 2015 4:40 AM (IST)
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दीपावली बन कर जग का तम दूर करो

प्रभात रंजन कथाकार दीवाली जिस दिन मनायी जाती है, वह दिन उस महीने का सबसे अंधेरा दिन होता है- कार्तिक मास की अमावस्या. कथा है कि जब भगवान राम लंका विजय के बाद, वनवास बिता कर अयोध्या लौटे थे, तो उनके स्वागत में प्रकाश का यह पर्व मनाया गया था. इस कथा का एक प्रतीक […]

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प्रभात रंजन
कथाकार
दीवाली जिस दिन मनायी जाती है, वह दिन उस महीने का सबसे अंधेरा दिन होता है- कार्तिक मास की अमावस्या. कथा है कि जब भगवान राम लंका विजय के बाद, वनवास बिता कर अयोध्या लौटे थे, तो उनके स्वागत में प्रकाश का यह पर्व मनाया गया था.
इस कथा का एक प्रतीक यह बनता है कि यह रावण के अपराजेय समर में राम की जीत के शाश्वत संदेश का त्योहार.
इसका एक प्रतीकार्थ यह भी माना जा सकता है कि यह उम्मीद की रोशनी का सबसे बड़ा त्योहार है- सबके जीवन में उजाला हो. फिराक गोरखपुरी की नज्म याद आ रही है- ‘शब का चेहरा है नूरानी दीपावली के दीप जले/ जुग-जुग से इस दुखी देश में मन जाता है हर त्योहार/ रंजो-खुशी की खींचा-तानी दीपावली के दीप जले!’ यानी एक ऐसे देश में उम्मीदों का सबसे बड़ा त्योहार, जहां बड़े स्तर पर गरीबी है, बदहाली है. बढ़ती महंगाई से लोगों का जी हलकान हुआ जा रहा है. लेकिन फिर भी दीपावली हर साल आती है और एक दिन के लिए सबको खुश कर जाती है.
इसी तरह से दीपावली से जुड़ी लक्ष्मी की कथा के प्रतीक को भी समझा जा सकता है. कहा जाता है कि इस दिन दीया रात भर जला कर रखना चाहिए, क्योंकि लक्ष्मी इस रात घर-घर समृद्धि बांटती फिरती हैं. सबके घर में खुशहाली फैले, दीपावली का एक संदेश यह भी है.
एक तरफ यह साल भर में नयी-नयी वस्तुएं खरीदने के सबसे बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है, तो हर आदमी खरीदने और देने के भावों से भरा होता है. महानगरों में यह उपहार देने के भी सबसे बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है.
एक वर्ग खरीदने के लिए, देने के लिए, घूमने के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए, जुआ खेलते हुए इस पर्व को मनाता है. दूसरी तरफ समाज का बड़ा तबका आज भी दूसरों के घर रोशनी देखते हुए, बाजारों की रौनक देखते हुए दीपावली के पर्व को मनाता है. यह अभावों भरे घर में भाव का दीया और उम्मीद की बाती जलाने का पर्व है. जो नहीं है, उसकी उम्मीद को मुसलसल बनाये रखने का त्योहार.
गोपालदास नीरज के गीत की पंक्तियां हैं- ‘तुम दीपावली बन कर जग का तम दूर करो/मैं होली बन कर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा!’
इन पंक्तियों से याद आया कि ऐसे समय में जब समाज में दूरियां बढ़ रही हैं, बढ़ाये जाने की कोशिशें हो रही हैं, वैसे में यह मिलने-जुलने का सबसे बड़ा त्योहार है. कहते हैं, इस दिन अगर कोई दुश्मन भी घर आ जाये, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में दीपावली हर साल यह संदेश दे जाती है कि मिलते-जुलते रहें, मिल-जुल कर रहें.
इस तेजगाम भागती जिंदगी में दीपावली अब एक दिन अपनों से मिलने, हर मिलनेवाले को अपना बनानेवाला त्योहार बन गया है. यही बात इसे धर्म से ऊपर उठ कर भारतीय संस्कृति के एक प्रतीक के रूप में शाश्वत बनाये हुए है. दीपावली भारत के होने की मजबूत परंपरा का सबसे बड़ा उत्सव है, रोशनी तो होनी ही चाहिए न! दीपावली की शुभकामनाएं!
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