नगराज की अंगूठी में श्रद्धा का नग!

Updated at : 07 Nov 2015 5:07 AM (IST)
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नगराज की अंगूठी में श्रद्धा का नग!

बुद्धिनाथ मिश्रा वरिष्ठ साहित्यकार शरद पूर्णिमा की रात में जब पूरा देश विभिन्न रूपों में उत्सव मना कर महालक्ष्मी की उपासना कर रहा था, मैं बैकुंठ से एक बांस नीचे, नर-नारायण पर्वतों की गोद में स्थित बदरीनाथ मंदिर में तपोरत भगवान विष्णु की अलौकिक शोभा को निहार रहा था. उस रात कोजागरा पर्व था. मिथिला […]

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बुद्धिनाथ मिश्रा
वरिष्ठ साहित्यकार
शरद पूर्णिमा की रात में जब पूरा देश विभिन्न रूपों में उत्सव मना कर महालक्ष्मी की उपासना कर रहा था, मैं बैकुंठ से एक बांस नीचे, नर-नारायण पर्वतों की गोद में स्थित बदरीनाथ मंदिर में तपोरत भगवान विष्णु की अलौकिक शोभा को निहार रहा था. उस रात कोजागरा पर्व था.
मिथिला के नव वर-वधुओं के लिए विशेष पर्व. वैसे भी, वयस्क गृहस्थ दंपति आश्विन पूर्णिमा की रात में पूर्णेंदु की आह्लादक चांदनी में बैठ कर सकल दुख-दारिद्र्य को मिटाने और दीर्घायु-आरोग्य तथा सुख-संपदा को पाने के लिए जगन्माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं. चंद्रमा और लक्ष्मी दोनों समुद्र-मंथन से निकले हैं, इसलिए भाई-बहन हैं. लक्ष्मी पूरे जगत की माता हैं, इसलिए चंद्रमा सबके मामा हुए- चंदामामा. कोजागरा की रात में लक्ष्मी और कुबेर के साथ-साथ पूर्णेंदु यानी पूरे चांद की भी पूजा होती है.
पूर्णिमा हुई मास की पंद्रहवीं तिथि. शास्त्रीय विधान है- ‘कौमुद्यां पूजयेत्‌ लक्ष्मीम्‌, अक्षैः जागरणं चरेत्‌.’ शरद पूर्णिमा की टहटह इजोरिया रात में गणपति आदि पंचदेवता और विष्णु की पूजा के बाद लक्ष्मी-इंद्र-कुबेर की पूजा विस्तार से की जाती है. उसके बाद रात भर जुआ खेल कर मनोरंजन करने का विधान है, जो अब समाज ने नव वर-वधुओं को सौंप दिया है, जिसमें घर-परिवार की शरारती युवतियों की विशेष भूमिका होती है.
जब मैं बदरीनाथ मंदिर के परिसर के बाहर खड़ा होकर अलकनंदा की तेज धार और तप्तकुंड से निकलते भाप में नहाते देवी-देवताओं को निहार रहा था, तब चंद्रमा बादल से भी ऊंचे पर्वत-शिखरों को लांघ कर वहां के छोटे-से आकाश में उदित हो गया था और अपनी सोलह कलाओं से दसों दिशाओं को आलोकित करने लगा था.
वहां आकाश है ही कितना बड़ा? चारों ओर से तो ऊंचे पहाड़ घेरे हैं- मेरे नगपति, मेरे विशाल! कितनी शांति थी पूरे परिवेश में! मंदिर के कपाट कब के बंद हो चुके थे. जो दो-चार तीर्थयात्री शयन आरती के समय दिखे थे, वे भी अपने-अपने कमरे में जाकर रजाई में दुबक गये थे. यहां कहने को तो सब आश्रम हैं, मगर अधिकतर आश्रमों का कारोबार होटल की तरह है. भारत सेवाश्रम संघ अभी तक पुरानी रीति पर चल रहा है, जहां की अर्थव्यवस्था धर्मबुद्धि तीर्थयात्रियों के दान और विदा होते समय स्वविवेक से प्रदत्त सहयोग-राशि से चलती है. आर्थिक स्रोत सूख जाने से न केवल आश्रम होटल बन गये हैं, बल्कि स्वयं मंदिर के हर क्रिया-कलाप को संपन्न करने के लिए रेट तय कर दिये गये हैं.
यदि आपको मंदिर के गर्भगृह में बैठ कर भगवान का प्रातःकालीन अभिषेक देखना है, तो निर्धारित शुल्क जमा कीजिए. इन दिनों यहां तीर्थयात्रियों का सैलाब नहीं रहता और यात्रा थोड़ी खतरनाक भी है, क्योंकि वर्षा से भींगे पहाड़ कब खिसक कर रास्ते पर पसर जाएं, कहा नहीं जा सकता.
कम लोगों को मालूम होगा कि बदरीनाथ शब्द में बदरी का अर्थ लक्ष्मी है, बेर फल नहीं. विष्णु की कठोर तपस्या को देख कर लक्ष्मी बदरी वृक्ष बन कर छाया देने लगीं, इसलिए इस नारदीय क्षेत्र में उनका नाम बदरी पड़ा और विष्णु बदरीनाथ हो गये.
नारद मुनि को शाप है कि वे कहीं एक स्थान पर नहीं रहते, लेकिन इस क्षेत्र में वे अनंतकाल तक रह सकते हैं. यहां जिस खंडित विष्णु-प्रतिमा को आदि शंकराचार्य ने नारद कुंड से निकाल कर स्थापित किया था, वह तपोरत विष्णु की है. पूरा हिमालय भगवान शिव की लीलाभूमि है. यहां विष्णु पद्मासन में बैठे उग्र तपस्या में लीन हैं. उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं सिर के दाहिने-बाएं बिखरी हैं.
प्रातःकालीन अभिषेक के समय सबसे पहले उनकी नाभि में चंदन लगाया जाता है, ताप हरने के लिए. फिर वक्षःस्थल, फिर सारा शरीर. इस ठंढ प्रदेश में तप का इतना ताप! इसी तपोबल से वे सारी सृष्टि का पालन कर पाते हैं. इसके बाद प्रतिमा को नये वस्त्रों से ढंक दिया जाता है.
भक्तगण केवल उनका मुख देख पाते हैं. विष्णु की मूर्ति की बायीं ओर लक्ष्मी, नारद और नर-नारायण की मूर्ति है और बायीं ओर कुबेर का बड़ा-सा चांदी का मुखौटा. सामने गरुड़ महाराज. मेरे लिए अभिषेक के समय गर्भगृह में रसीद कटा कर जाना संभव नहीं था, इसलिए द्वार पर अन्य दर्शनार्थियों की भीड़ में बर्फीले पत्थर पर खड़े होकर पूरे दो घंटे तक एकटक देव-विग्रहों की पारंपरिक अर्चना को निहारना मेरे लिए तो सुखद रहा, अन्यों की बात नहीं जानता. प्रबंध समिति चाहे तो वहां टाट बिछा कर भक्तों के पांवों को कुछ आराम दे सकती है.
बदरीनाथ मंदिर के प्रति सामान्यजन की जो अपार श्रद्धा है, उसे सुरक्षित रखने के लिए इसकी प्रबंध समिति को दक्षिण के कुछ मंदिरों से नयी बातें सीखनी चाहिए. मसलन, दोपहर में जो भगवान के भोग का भात-दाल-खिचड़ी का प्रसाद बंटता है, वह धनाढ्य भक्तों के दान से ही बनता है, मगर जिस तरह से भक्तों में वितरित होता है, वह बड़ा ही अपमानजनक है.
दक्षिण के कुछ मंदिरों की भांति नयी तकनीक का प्रयोग कर भक्तों को ठीक से बिठा कर सम्मानित ढंग से प्रसाद खिलाया जा सकता है, जिस पावन याद को वे सहेज कर ले जा सकें.
इसी प्रकार, मंदिर में जो प्रसाद भक्तगण चढ़ाते हैं, उसे भी काशी के संकट मोचन मंदिर की तरह यथावत्‌ भक्तों को तुलसीदल देकर भक्तों को लौटा दिया जाना चाहिए, जिससे उनके परिवारों में जाकर उसका सदुपयोग हो सके. मंदिर की ओर से सत्संग, संगोष्ठी आदि की कोई व्यवस्था नहीं है, जिसमें भाग लेकर यात्रीगण अपना समय व्यतीत कर सकें और कुछ वैचारिक प्रसाद लेकर घर लौट सकें. हिंदू मंदिरों की स्थापना का एक प्रमुख प्रयोजन यह भी था.
सामान्यतः कोजागरा के दिन मैं अपने ग्रामीण क्षेत्र में पान-मखान का आनंद लेता था, लेकिन इस बार संपूर्ण बिहार निम्नकोटिक चुनाव-प्रचारों के कारण ‘बदरीवन’ (बेर का जंगल) बन गया था, जिसमें इस कदलीपत्र का वास वहां नहीं था, इसलिए बदरिकाश्रम जाने का कार्यक्रम अचानक बना, वह भी दो मित्रों के साथ, साधारण बस से. मगर अंतहीन पर्वतीय सुषमा को निरखते और भागीरथी-अलकनंदा की ऊर्जस्वित धार को देखते हुए कुल छह सौ किलोमीटर की वह यात्रा कतई कष्टदायक नहीं लगी.
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