कुप्रथाओं से मुक्ति का लें संकल्प

ठीक है कि 70 प्रतिशत भारतीय छुआछूत में विश्वास नहीं करते, पर यह सच्चाई डरानेवाली है कि 30 प्रतिशत अभी भी कुछ को ‘कम मनुष्य’ मानते हैं. ‘कम मनुष्य’ माननेवालों की संख्या शून्य कब होगी? बहुत पुरानी बात है. राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे में मैं रहता था. सिर पर मैला ढोने की प्रथा वहां […]
ठीक है कि 70 प्रतिशत भारतीय छुआछूत में विश्वास नहीं करते, पर यह सच्चाई डरानेवाली है कि 30 प्रतिशत अभी भी कुछ को ‘कम मनुष्य’ मानते हैं. ‘कम मनुष्य’ माननेवालों की संख्या शून्य कब होगी?
बहुत पुरानी बात है. राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे में मैं रहता था. सिर पर मैला ढोने की प्रथा वहां आम थी. और मैला ढोनेवाले को छूना भी पाप है, यह बात एक स्वाभाविक रूप में समाज का हिस्सा थी. मैला ढोना, मृत जानवरों को ठिकाने लगाना, चमड़े का काम करना आदि भले ही समाज के लिए कितने ही जरूरी क्यों न थे, उन्हें ‘छोटा’ ही नहीं, घृणा करने के स्तर तक घटिया समझा जाता था. जिस जाति-व्यवस्था में हमने अपने समाज को ढाला हुआ था, उसमें छुआछूत जैसा व्यवहार करनेवाला, और जिसके साथ यह व्यवहार होता है, वह भी, इसे स्वाभाविक मान कर ही चलता था. वैयक्तिक और सामूहिक संस्कारों के चलते यह सब सामान्य लगता था. यह सब यानी कथित ‘घटिया’ काम करनेवालों को नहीं छूना, उन्हें गांव के कुएं से पानी न भरने देना, उनके बर्तनों को, घर में या चाय की दुकानों पर अलग रखना, उन्हें मंदिरों में प्रवेश न करने देना, स्कूल में उनका बाकी बच्चों से अलग बैठना, उनकी बस्तियों का अलग-थलग होना आदि बातें तब मुझे चौंकाती नहीं थीं. चौंकाया मुझे उस बात ने, जब एक दिन मैंने घर का मैला ढोनेवाले को यह कहते सुना कि धोबी उनसे नीची जाति के हैं, वे धोबियों के हाथ का छुआ नहीं खाते. पर उम्र के साथ ज्ञान भी बढ़ता गया और समझ भी. हालांकि, हमारे संविधान में तो छुआछूत को धारा 17 के अनुसार अपराध भी घोषित किया जा चुका है.
शहरों में, खासकर बड़े शहरों में, यह छुआछूत अब सामान्यतः दिखाई नहीं देती. शहरी-जीवन की स्थितियों ने, शिक्षा के कारण आ रहे विचार-परिवर्तन आदि ने भले ही कुछ बदलाव आता दिखाया हो, पर अभी हमारा समाज छुआछूत की मानसिकता से मुक्त नहीं हुआ है. ग्रामीण क्षेत्रों में, और कुछ शहरी क्षेत्रों में भी, इस छुआछूत के परिणामों से जुड़ी घटनाएं अकसर घटती हैं. दलित समाज आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर है. आज भी सामान्यतः उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता; उनके लिए पृथक बर्तन रखे जाते हैं; ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में अकसर दलित बच्चों से सफाई करायी जाती है; दलितों को घोड़े पर बैठ कर बारात निकालने का अधिकार नहीं है. इस आशय के समाचार अकसर मीडिया में दिखते हैं.
इंडिया ह्यूमन डेवलेपमेंट सर्वे की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश की 27 प्रतिशत आबादी आज भी छुआछूत में विश्वास करती है! नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकाेनॉमिक रिचर्स तथा यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड द्वारा किये गये इस सर्वेक्षण के नतीजे कुछ अरसा पहले ही घोषित हुए हैं. सर्वेक्षण के अनुसार, देश के लगभग एक तिहाई लोग आज भी छुआछूत को मानते हैं और यह धारणा भी सही नहीं है कि शहरी इलाकों में छुआछूत नहीं है. सर्वेक्षण के अनुसार, शहरी इलाकों में छुआछूत माननेवालों का प्रतिशत 20 है. यानी देश का हर पांचवां शहरी आज भी छुआछूत की भावना से उबरा नहीं है. हां, ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत 30 है. इसका मतलब यह हुआ कि 27 प्रतिशत भारतीय खुलेआम छुआछूत को स्वीकार रहे हैं.
छुआछूत की यह अवधारणा किस गहराई तक समूचे भारतीय समाज में धंसी हुई है, इसका उदाहरण राजस्थान के उस कस्बे का वह धोबी ही नहीं था, जो मैला ढोनेवाले की दृष्टि में उससे नीचा था. इस सर्वेक्षण ने यह भी बताया कि छुआछूत में विश्वास करनेवालों में ब्राह्मणों के बाद जिस वर्ग का स्थान है, वह है ओबीसी अर्थात अन्य पिछड़ी जातियां. सर्वेक्षण में ओबीसी तबके के 15 प्रतिशत लोगों ने छुआछूत में विश्वास करने की बात स्वीकारी थी. 35 प्रतिशत जैन छुआछूत को मानते हैं, 30 प्रतिशत हिंदू. यही नहीं, हिंदू समाज की कुरीतियों से उबरने के लिए सिख और मुसलमान बने लोगों में भी क्रमशः 23 और 18 प्रतिशत लोग छुआछूत से नहीं उबर पाये हैं! अर्थात धर्म-परिवर्तन के बावजूद मानसिकता नहीं बदली है.
गांधीजी ने कहा था कि ‘हिंदू धर्म के सुधार और संरक्षण के लिए छुआछूत को मिटाना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है. अगर छुआछूत कायम रहती है, तो हिंदू धर्म को खत्म हो जाना चाहिए.’
यदि हमें सही अर्थों में मनुष्य बने रहना है, तो छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ लड़ना होगा. एक बीमार मानसिकता से उबरना होगा. यह अच्छा है कि 70 प्रतिशत भारतीय छुआछूत में विश्वास नहीं करते, पर यह सच्चाई डरानेवाली है कि 30 प्रतिशत अभी भी कुछ को ‘कम मनुष्य’ मानते हैं. ‘कम मनुष्य’ माननेवालों की संख्या शून्य कब होगी? जब ऐसा होगा तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे. ऐसा तब होगा, जब हममें से हर एक व्यक्ति अस्पृश्यता के अभिशाप से मुक्त होने का संकल्प ले.
विश्वनाथ सचदेव
वरिष्ठ पत्रकार
navneet.hindi@gmail.com
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