धार्मिक अतिक्रमणों से मुक्ति

Published at :24 Jul 2015 2:30 AM (IST)
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धार्मिक अतिक्रमणों से मुक्ति

सुभाष गाताडे सामाजिक कार्यकर्ता क्या भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का इस्तेमाल धर्म आधारित राजनीति को प्रोत्साहन देने के लिए किया जा रहा है? पिछले दिनों केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा यह कड़ी टिप्पणी दिल्ली की सड़कों पर फैलते धार्मिक ढांचों व अतिक्रमणों को हटाने में टालमटोल पर की गयी. आयोग ने दिल्ली पुलिस को […]

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सुभाष गाताडे

सामाजिक कार्यकर्ता

क्या भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का इस्तेमाल धर्म आधारित राजनीति को प्रोत्साहन देने के लिए किया जा रहा है? पिछले दिनों केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा यह कड़ी टिप्पणी दिल्ली की सड़कों पर फैलते धार्मिक ढांचों व अतिक्रमणों को हटाने में टालमटोल पर की गयी.

आयोग ने दिल्ली पुलिस को यह आदेश दिया कि वह इस सिलसिले में लोक निर्माण विभाग को यह सूचित करे कि उपरोक्त अवैध ढांचा हटाने के मामले में वह कब तक कार्रवाई करेगा.

मालूम हो कि रोहतक रोड पर अवैध ढंग से बने धार्मिक ढांचे, जिसने इलाके के लोगों की शांति भंग की है और यातायात के लिए भी जो खतरा है, को वहां से हटाने की जानकारी अपीलकर्ता ने मांगी थी. आयोग ने चिंता प्रकट की कि हर धार्मिक अतिक्रमण एक जटिल संकट को जन्म देता है, जिसे फिर नेताओं की तरफ से हवा दी जाती है.

प्रार्थनास्थलों के अवैध निर्माणों या धार्मिक उत्सवों के अवसरों पर गैरकानूनी ढंग से पंडाल खड़ा करने आदि का मसला अब समूचे देश के पैमाने पर चिंता का सबब बन रहा है, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, बाकी अदालतें भी निर्देश दे चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सभी राज्यों ने गिनती कर उसे सूचित किया है कि उनके यहां कितने अवैध धार्मिक स्थल हैं.

ऐसे धार्मिक स्थल सड़कों-चौराहों के अलावा गली-मोहल्लों या अपार्टमेंट में भी तेजी से बनते दिखते हैं, जो स्थानीय स्तर पर बच्चों के खेल-कूद की जगहों पर कब्जा करने का जरिया बनते हैं.

पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत ने राजधानी की एक आवासीय सोसायटी में पानी की टंकी पर अवैध ढंग से बने मंदिर को गिराने का आदेश दिया. अपार्टमेंट के निवासी की निजता के अधिकार की याचिका को मंजूर करते हुए उसने दो माह के अंदर मंदिर को वहां से हटाने तथा उसे सोसायटी के अंदर या बाहर कहीं प्रतिस्थापित करने का निर्देश दिया तथा अवैध ढंग से मंदिर बनाने के लिए सोसायटी के दो सदस्यों पर पचास हजार रुपये का जुर्माना ठोंका, जिसका भुगतान उन्हें याचिकाकर्ता को करना होगा.

याचिकाकर्ता का कहना था कि मंदिर में लाउडस्पीकर्स के इस्तेमाल और वहां नियमित चलनेवाले धार्मिक आयोजनों से उनका शांति से जीना दुश्वार हो गया है. उन्हें रात की नींद नहीं मिल पाती है.

उधर, मुंबई में एक अन्य सचेत नागरिक के हस्तक्षेप के चलते आया हाइकोर्ट का आदेश धार्मिक अतिक्रमणों के अस्थायी रूप को रेखांकित करता है. आये दिन त्योहारों के नाम पर सड़कों पर पंडाल लगाने, बाजा बजाने और साधारण नागरिकों के सड़कों-फुटपाथों पर सुरक्षित चलने के मूल अधिकार के बाधित होने की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए थाणो के डॉ बेडेकर ने याचिका डाली थी. महानगरपालिका के वरिष्ठ अधिकारियों को इस संबंध में डांट लगाते हुए हाइकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ‘सार्वजनिक स्थान पर पूजा का आयोजन मूल अधिकार में शामिल नहीं होता’.

आस्था का सवाल हमारे दौर में जितना संवेदनशील हुआ है, उसके मद्देनजर अकसर इस मसले को आसानी से निपटाना आसान नहीं होता. लेकिन, अगर सही ढंग से समझाया जाये, तो आम लोग आस्था के प्रश्न को जनहित के मातहत करने को तैयार भी हो जाते हैं.

वर्ष 2005-2006 के दरम्यान मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर में डेढ़ साल के अंतराल में 168 धार्मिक स्थल प्रतिस्थापित किये गये! क्या आज यह बात किसी को आसानी से पच सकती है कि शहर के यातायात एवं सामाजिक जीवन को तनावमुक्त बनाये रखने के लिए सभी आस्थाओं से संबंधित लोगों ने इसके लिए मिल-जुल कर काम किया और देश के सामने ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की नयी मिसाल पेश की? जबलपुर की इस नायाब पहल के कुछ वक्त पहले ‘मंदिरों के शहर’ कहे जानेवाले दक्षिण के मदुरई ने भी अपने यहां कुछ ऐसा ही किया था.

हाइकोर्ट के आदेश (3 फरवरी, 2005) के तहत नगरपालिका की अगुआई में अनधिकृत ढंग से बनाये गये 250 से अधिक मंदिर, दो चर्चो एवं एक दरगाह को हटाया गया. मुंबई में भी आम नागरिकों के संगठित हस्तक्षेप के चलते एक हजार से अधिक अवैध प्रार्थना स्थलों को प्रशासन ने हटा दिया है.

दरअसल, यह सिलसिला शुरू हुआ था एक सामाजिक कार्यकर्ता श्री भगवान रैयानी द्वारा वर्ष 2002 में दायर जनहित याचिका के बाद. रैयानी ने अपनी इस सफल मुहिम के बारे में रिडिफडॉटकाम को दिये साक्षात्कार (11 नवंबर, 2003) में महत्वपूर्ण बात कही थी, ‘अगर मैं हिंदू हूं और कानून का उल्लंघन करके कोई मंदिर बनाता हूं, तो उससे अन्य धर्मियों को अलगाव महसूस होगा.

यही स्थिति अन्य धर्मो के बारे में कह सकते हैं कि अगर वे गैरकानूनी ढंग से मसजिद, गुरुद्वारा या चर्च बनाते हैं, तो मुङो यह नागवार गुजरेगा. समाज में इससे फैलती दुर्भावना को दूर करने के लिए ही मैंने यह कदम उठाया.’कितने सरल शब्द, लेकिन अमल करने में कितना मुश्किल!

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