इस मरहम से क्या भरेंगे घाव ?

Published at :09 Sep 2013 3:30 AM (IST)
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इस मरहम से क्या भरेंगे घाव ?

गुवा गोलीकांड में मारे गये आठ आंदोलनकारियों के परिजनों को सरकारी नौकरी दे दी गयी है. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद आंदोलनकारियों के लिए यह थोड़ी–सी सुकून देनेवाली खबर हो सकती है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की यह पहल 33 साल बाद पश्चिम सिंहभूम के गुवावासियों के घावों पर थोड़ा मरहम जरूर लगा सकती है, […]

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गुवा गोलीकांड में मारे गये आठ आंदोलनकारियों के परिजनों को सरकारी नौकरी दे दी गयी है. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद आंदोलनकारियों के लिए यह थोड़ीसी सुकून देनेवाली खबर हो सकती है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की यह पहल 33 साल बाद पश्चिम सिंहभूम के गुवावासियों के घावों पर थोड़ा मरहम जरूर लगा सकती है, लेकिन यह घाव इतने दिनों में नासूर बन चुका है, जिसे जल्द भरना मुश्किल होगा. वह घटना गुलाम भारत के जलियांवाला बाग की घटना की याद दिलाती है. अस्पताल में इलाज के लिए तड़प रहे आठ घायल आंदोलनकारियों को पुलिस ने बाहर निकाल कर उन पर गोलियों की बौछार कर दी थी.

ऐसी कुर्बानियों के बाद जब अलग झारखंड राज्य बना, तभी से इनके परिजन इंसाफ की आस लगाये थे. खैर वर्तमान सरकार को उनकी कुर्बानी याद आयी. लेकिन, झारखंड आंदोलनकारी अब भी अपना हक पाने के इंतजार में हैं. यहां की सरकार इनके लिए कई बार कई योजनाओं की घोषणा कर चुकी है. लेकिन, इस घोषणाओं पर अमल नहीं हो पाया है. इनसे जुड़ी सभी घोषणाएं लालफीताशाही में फंसी हुई हैं. सरकार को झारखंड आंदोलनकारियों को न्याय देने में देर नहीं करनी चाहिए. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जिस प्रकार गुवा गोलीकांड से जुड़े आंदोलनकारियों को न्याय दिलाने की कोशिश की है, उनकी यह तत्परता काबिलतारीफ है.

ठीक इसी प्रकार की तत्परता तमाम झारखंडी आंदोलनकारियों के लिए भी जरूरी है. झारखंड के ये आंदोलनकारी अपने साथ न्याय के लिए ब्रितानिया हुकूमत से लेकर आजाद भारत की सरकार तक से तीरधनुष के बल पर लंबी लड़ाई लड़ते रहे. इनके साहस वीरता की कहानियां अब इतिहास में है. इसी आंदोलन की उपज है झारखंड मुक्ति मोरचा, जिसकाविधायक होने के नाते हेमंत सोरेन की जिम्मेवारी यूं भी बढ़ जाती है.

झामुमोकांग्रेस की इस नयी सरकार को झारखंड गठन के पीछे के नायकों की याद आयी है, जो इस सरकार यहां के समाज की सेहत के लिए भी अहम है. अगर यहां के सभी आंदोलनकारियों को न्याय मिला, तो सही मायने में झारखंड बनने का औचित्य पूरा होगा. यह भी दिखेगा कि अब सही मायने में झारखंड आगे बढ़ रहा है.

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