अच्छा स्वास्थ्य नहीं तो विकास व्यर्थ है

Published at :06 May 2015 12:17 AM (IST)
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अच्छा स्वास्थ्य नहीं तो विकास व्यर्थ है

प्रदूषण से स्वास्थ्य पर पड़नेवाले खतरनाक प्रभावों के बारे में देश और दुनिया को लंबे समय से जानकारी है, लेकिन सरकार, उद्योग जगत और समाज की लापरवाही तथा विकास की अंधी दौड़ के कारण इस समस्या ने आज एक विकराल रूप ले लिया है. विश्व अस्थमा दिवस (पांच मई) के मौके पर विशेषज्ञों ने भारत […]

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प्रदूषण से स्वास्थ्य पर पड़नेवाले खतरनाक प्रभावों के बारे में देश और दुनिया को लंबे समय से जानकारी है, लेकिन सरकार, उद्योग जगत और समाज की लापरवाही तथा विकास की अंधी दौड़ के कारण इस समस्या ने आज एक विकराल रूप ले लिया है.
विश्व अस्थमा दिवस (पांच मई) के मौके पर विशेषज्ञों ने भारत के शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक वायु प्रदूषण से दमा जैसी बीमारियों के तेजी से बढ़ने पर चिंता जतायी है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय संस्था हील फाउंडेशन ने कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में तीन माह तक किये सर्वेक्षण में पाया है कि स्कूल जानेवाले बच्चों में करीब 35 फीसदी फेफड़े से जुड़ी समस्याओं से बुरी तरह पीड़ित हैं.
इस मामले में राजधानी दिल्ली की हालत और खराब है, जहां 40 फीसदी ऐसे बच्चे इस श्रेणी में हैं. हालांकि प्रदूषण के अलावा कुछ अन्य कारक भी इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हो सकते हैं, पर प्रदूषित इलाकों में अधिक बच्चे बीमारी से ग्रस्त हैं.
वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर किये गये आकलन के अनुसार देश में 1.7 से तीन करोड़ के बीच दमा के शिकार या संभावित शिकार हो सकते हैं. यह आंकड़ा तपेदिक और एचआइवी/एड्स के प्रभावितों की संयुक्त संख्या से भी अधिक है. पांच से 11 वर्ष के बच्चों की कुल संख्या का 10 से 15 फीसदी इस आंकड़े में शामिल है.
वायु प्रदूषण के साथ जल और खाद्य प्रदूषण भी बढ़ रहे हैं. दिल्ली और कोलकाता को तो निवास के लिए सबसे खतरनाक शहरों में गिना जाता है. हाल में कई विदेशी एजेंसियां और विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि ये महानगर प्रतिभाओं के काम करने लायक नहीं रह गये हैं. यह समस्या महानगरों के बाद शहरों और कस्बों तक में पैठ बनाने लगी है. वाहनों, फैक्टरियों, विद्युत संयत्रों एवं कोयला जलाने से पैदा होनेवाला धुआं वायु प्रदूषण का मुख्य कारण है.
दुर्भाग्य की बात है कि विकास का तर्क देकर औद्योगिक इकाइयों और परियोजनाओं से होनेवाले पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को नजरअंदाज करने, सड़कों पर वाहनों की भीड़ बेतहाशा बढ़ाने की प्रवृत्ति जोरों पर है. शहरीकरण और उद्योग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि लोगों का स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिकी नहीं बचा पाये तो ये किस काम के! सुख और समृद्धि के लिए पर्यावरण और विकास में संतुलन बनाना जरूरी है.
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