किसानों की सही चिंता किसी को नहीं

सच्चई यह है कि किसानों की सही चिंता किसी को नहीं है. उसकी चिंता कर हम मनुष्य बने रह सकते हैं. मनुष्यता भी जीवित रहेगी. भारत उद्योगपतियों का देश है या किसानों का? क्या दोनों में कोई सहज रिश्ता संभव है? किसान एक साथ सत्ता-व्यवस्था और प्राकृतिक कहर से जूझ रहा है. उसकी जुझारू शक्ति […]
गरीबी और अमीरी की खाई गांव और शहर में बढ़ रहे फैसले सरकारी नीतियों के तहत हैं. किसान खेती छोड़ने, गांव छोड़ने और मजदूर बनने के लिए विवश है. प्रेमचंद ने तीस के दशक के आरंभ में ही पहचान लिया था कि सामान्य किसान मजदूर बनेगा. होरी किसान से मजदूर बना. पिछले एक दशक में किसानों की संख्या करीब एक करोड़ घटी है. उन्होंने खेती छोड़ दी है.
लालबहादुर शास्त्री ने जब ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था, उनकी चिंता में एक साथ देश की प्रगति और बाह्य सुरक्षा का सवाल बड़ा था. स्वतंत्र भारत में विकास की सभी नीतियां कृषक-विरोधी रही हैं. आजादी के कुछ महीने बाद 12 अप्रैल, 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने ओड़िशा में हीराकुंड बांध की नींव रखते समय किसानों को देश के लिए कष्ट उठाने को कहा था. उस समय से आज तक विस्थापितों की संख्या चार-पांच करोड़ है. किसानों के लिए उद्योगपति, प्रभवर्ग, शासक वर्ग के साथ सरकारी अफसरों-कर्मचारियों ने कष्ट नहीं उठाया. अंगरेजों ने 1894 में जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया, वह करीब 120 वर्ष तक क्यों कायम रहा? इस कानून को बदलने में जहां 120 वर्ष लगे, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2013 में बदले कानून को झटपट एक वर्ष में (2014) बदल दिया. मोदी सरकार को ‘फैसिलेटेटर’ के रूप में देखते हैं. उनका लगातार विदेशी दौरा पूंजी निवेशकों को बुलाने, आकर्षित करने के लिए है. सरकार का काम देशी-विदेशी निवेशकों व निगमों को समस्त सुविधाएं प्रदान करना है. कांग्रेस किसानों को लेकर जो चिंतित दिख रही है, वह चिंता ऊपरी है. मनमोहन सिंह ने करोड़ों टन गेहूं सड़ने दिया, सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी गरीबों में उसका वितरण नहीं किया गया. मुट्ठी भर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, कॉरपोरेटों के हवाले देश कर दिया गया है. बारिश, आंधी और तूफान से उजड़े गांवों, किसानों को थोड़ी राहत दी जा सकती है, मुआवजा भी दिया जा सकता है (दिया जाता है), पर किसानों की हालत तब तक नहीं सुधर सकती, जब तक ‘विकास’ की शैतानी अवधारणा में सुधार नहीं किया जाता. आज भी देश की अधिक आबादी किसानों की है, पर उनकी चिंता किसी को नहीं है. राजनीतिक दलों का चरित्र बदल चुका है. सारे आयोजन शहरों के पांच सितारा होटलों में होते हैं. रोजगार के किसी वैकल्पिक साधन के अभाव में किसानों का जीना दूभर हो चला है. ‘उत्तम खेती’ वाली बात पुरानी हो चुकी है. अब छोटे किसानों के लिए खेती करना मजबूरी है. खाद्यान्न की कीमत पिछले 40-45 वर्षो में अधिकतम बीस गुना बढ़ी है, जबकि कर्मचारियों के वेतन में सौ गुना का इजाफा हुआ है. शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च दो सौ-तीन सौ गुना बढ़ा है और जमीन की कीमत बेतहाशा बढ़ी है- हजार गुना से अधिक.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




