भूकंप की त्रसदी और हमारी लापरवाही

Published at :27 Apr 2015 6:02 AM (IST)
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भूकंप की त्रसदी और हमारी लापरवाही

भूगर्भ को जानने का दावा करनेवाली कोई भी प्रयोगशाला यह दावा करने की स्थिति में नहीं पहुंच पायी है कि अमुक स्थान पर इस या उस तीव्रता और बारंबारता के साथ भूकंप आयेगा. भूकंप के बारे में यह अनजानापन इसे सर्वाधिक भयानक प्राकृतिक आपदाओं में एक बनाता है. परंतु, भूकंप के बारे में सटीक भविष्यवाणी […]

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भूगर्भ को जानने का दावा करनेवाली कोई भी प्रयोगशाला यह दावा करने की स्थिति में नहीं पहुंच पायी है कि अमुक स्थान पर इस या उस तीव्रता और बारंबारता के साथ भूकंप आयेगा. भूकंप के बारे में यह अनजानापन इसे सर्वाधिक भयानक प्राकृतिक आपदाओं में एक बनाता है. परंतु, भूकंप के बारे में सटीक भविष्यवाणी कर पाने में अक्षमता का मतलब यह नहीं है कि मनुष्यता अपने बचाव के उपाय ही न करे.

कहा जा सकता है कि हम भूकंप से नहीं, बल्कि उससे होनेवाले नुकसान से डरते हैं और इसी कारण भूकंप की भयावहता जान-माल के नुकसान के आधार पर मापते हैं. प्राकृतिक आपदा के रूप में भूकंप मनुष्य जाति के सबसे प्राचीनतम अनुभवों में से एक है और उसने इस अनुभव से बहुत कुछ सीखा भी है. अब हम जानते हैं कि भारत इंडो-आस्ट्रेलियन भू-पर्पटी के उत्तर-पश्चिमी सिरे पर बसा है, और यह भू-पर्पटी भारत, आस्ट्रेलिया, हिंद महासागर और कुछ अन्य देशों जैसे नेपाल, पाकिस्तान आदि से होकर गुजरती है. हमें यह भी पता है कि इंडो-आस्ट्रेलियन भू-पर्पटी यूरेशियाई भू-पर्पटी से टकरा रही है. कभी दोनों को टेथिस नाम का एक समुद्र अलग करता था, पर समुद्र के विलोप के बाद ये भू-पर्पटियां टकराने लगीं. इनके टकराने से उनके आकार में परिवर्तन होता है और आकार का यही परिवर्तन कई दफा समुद्र, झील तथा पहाड़ की उत्पत्ति और वृद्धि का कारण बनता है. यही घर्षण भूकंप का कारण भी बनता है. मोड़दार पहाड़ के रूप में हिमालय और उसके पूरे क्षेत्र में दो भू-पर्पटियों की टकराहट के कारण ही लगातार उनकी ऊंचाई और उनके आकार में बदलाव हो रहा है. हिमालयी क्षेत्र की अस्थिर भौगोलिक स्थिति के बारे में इस तथ्य की पहचान के कारण भू-विज्ञानी और विशेषज्ञ बहुत दिनों से इस क्षेत्र में भयावह तीव्रता के भूकंप की आशंका जता रहे थे. वैसे तो भारत का कोई भी हिस्सा भूकंप के खतरे से मुक्त नहीं है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र भूकंप की तीव्र आशंका वाले क्षेत्रों में एक है. अगर इस जानकारी को कुछ अन्य बातों से जोड़ कर देखें, तो शनिवार को आये भूकंप से हमारे लिए कई सबक निकलते हैं. नेपाल में हुई क्षति का आकार और शनिवार के बाद से रह-रह कर पूरे उत्तर भारत में महसूस किये जा रहे भूकंप के झटके हमें फिर से याद दिला रहे हैं कि हमने अभी तक भूकंपरोधी प्राथमिकताओं को ध्यान में रख कर अपनी बस्तियों को बनाने की तत्परता नहीं दिखायी है. मिसाल के लिए, हिमालयी क्षेत्र के बहुत नजदीक स्थित भारत की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के उपनगरों को ही लें. ये इलाके फिलहाल इंफ्रास्ट्रक्चर के तेज विकास के दौर से गुजर रहे हैं. बड़े पैमाने पर पुल, फ्लाईओवर और मेट्रो बनाने के काम चल रहे हैं और बेशुमार आवासीय कॉलोनियां बन रही हैं. इन निर्माणों में इंडियन सिस्मिक कोड द्वारा निर्धारित भूकंपरोधी व्यवस्थाओं और सावधानियों को नजरअंदाज किया जा रहा है. यह कोड निर्मित की जा रही संरचना को भूकंपरोधी बनाने के लिए विशेष डिजाइन विकसित करने की बात कहता है. हमारे देश में पुराने पड़ गये कानूनों को खत्म करने और उनकी जगह पर कारगर और समयानुकूल कानून लाने की बात की जाती है, लेकिन शायद ही देश को कभी याद आया हो कि पुल बनाने के जो सिस्मिक कोड मौजूद हैं, वे अपने पुरानेपन के कारण अपनी प्राथमिकता खो चुके हैं. भारत में भूकंपरोधी निर्माण से संबंधित पहली संहिता 1935 में आये भूकंप के बाद बनी थी. ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड ने भूकंपरोधी डिजाइन की अपनी पहली संहिता 1962 में बनायी थी, पर अभी तक भारत ऐसा कोई कानून तैयार नहीं कर सका है, जिसमें इस संहिता को अनिवार्य तौर पर लागू करने का दिशा-निर्देश हो. वर्ष 1997 के भूकंप संवेदी एटलस पर यकीन करें, तो दिल्ली में रिक्टर पैमाने पर आठ अंक की तीव्रतावाला भूकंप आने से यहां के 85 फीसदी से ज्यादा मकान ढह सकते हैं. दूसरा सबक भूकंप से हुई क्षति को कम करने के लिए की गयी तैयारियों से जुड़ा है. भूकंप के बाद जिस तरह पूरे उत्तर भारत में रह-रह कर अफवाहों का बाजार गर्म हो रहा है, वह लोगों में जानकारी और जागरूकता के अभाव का सूचक है. जागरूकता बढ़ा कर जान-माल की क्षति कुछ हद तक कम की जा सकती है. हालांकि आपदा राहत की टीम कुछ ही घंटों में सक्रिय हुई और बचाव कार्य जल्दी शुरू कर दिया गया, फिर भी नेपाल में हुई भयावह क्षति ने यह तो जता ही दिया है कि अस्पताल, आपातकालीन परिवहन और संचार सहित बचाव और राहत से जुड़ी विभिन्न संस्थाएं तथा तंत्र भूकंप जैसी विपत्तियों से निपटने की आवश्यक क्षमता विकसित नहीं कर पाये हैं.

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