कहां ले जायेगी हमें ‘मेरी मर्जी’ वाली सोच

Published at :11 Apr 2015 5:37 AM (IST)
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कहां ले जायेगी हमें ‘मेरी मर्जी’ वाली सोच

दक्षा वैदकर प्रभात खबर, पटना जब मैं छोटी थी, तब गोविंदा का एक गाना आया था, ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं.. मेरी मर्जी.. ’ बचपन में यह गाना मेरी जुबां पर चढ़ गया था. जब भी मैं खेलने जाती और मम्मी-पापा पढ़ने को कहते, मैं ये गाने की लाइन सुना देती. तब […]

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दक्षा वैदकर

प्रभात खबर, पटना

जब मैं छोटी थी, तब गोविंदा का एक गाना आया था, ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं.. मेरी मर्जी.. ’ बचपन में यह गाना मेरी जुबां पर चढ़ गया था. जब भी मैं खेलने जाती और मम्मी-पापा पढ़ने को कहते, मैं ये गाने की लाइन सुना देती. तब दोनों ही मुझ पर खूब चिल्लाते और जबरदस्ती पढ़ने बिठाते.

आज सालों बाद लगता है कि अच्छा हुआ, जो उन्होंने मुङो ‘मेरी मर्जी’ चलाने नहीं दी. अब इतने सालों बाद इसी लाइन को इंगलिश में कहा है दीपिका पादुकोण ने. उन पर कटाक्ष करते हुए कई लड़कों ने भी वीडियो यूट्यूब पर डाले, जो आज घर-घर में चर्चा का विषय है.

‘माय चॉइस’ यानी ‘मेरी मर्जी’ वाकई यह मुद्दा काफी गंभीर और संवेदनशील है. भारतीय युवा अब सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत खूब करने लगे हैं और विद्रोही तेवर के साथ यह भी कहते हैं, मेरी मर्जी. इस मर्जी के कारण फायदे कितने और नुकसान कितना, यह बहस का मुद्दा हो सकता है. समाज में अनुशासन बना रहे, इसलिए कई बातों को लागू किया जाता है, जिसमें शादी जैसी प्रथा का प्रमुख योगदान है.

आज भारतीय युवा स्वतंत्रता की बात पश्चिमी देशों की अनुरूप कर रहा है, लेकिन वह उसे लागू भारतीय परिवेश में करना चाहता है. इसकी वजह से सोच व विचारों में टकराव पैदा हो रहा है. पश्चिमी देशों की खुली सोच और उसके परिणाम वहां के लोग भुगत रहे हैं.

हाल यह है कि किसी की शादी 5 साल भी टिक जाये, तो लोग पार्टी देते हैं. भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो महिलाओं और पुरुषों दोनों को समान रूप से देखा जाना चाहिए. परंतु हजारों वर्षो से जो परंपराएं चली आ रही है, उसका पालन न करने से समाज सुधरेगा या बिगड़ेगा, इसकी गारंटी कौन लेगा? क्या भारतीय परिवेश में यह सारी चीजें संभव हैं, जो दीपिका के वीडियो में दीपिका ने कही हैं. यह बात माननी होगी कि जब समाज में अनुशासन होगा, तो समाज आगे बढ़ेगा. हमारे पूर्वजों ने कुछ सोच-समझ कर ही शादी जैसी परंपरा को स्थान दिया होगा. अगर समाज इन सब बातों को मानना बंद कर देगा, तो मनुष्य और पशु में क्या अंतर रहा जायेगा.

बात कुछ कड़वी लग सकती है कि महिलाओं को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन हमें यह खुद सोचना होगा कि क्या स्वतंत्रता का मतलब केवल शारीरिक होता है? आज महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उन्हें पैरों पर खड़ा रखने के लिए आर्थिक रूप से मजबूत होने की जरूरत है.

न कि इन बातों पर बहस करने की जरूत है कि क्या कपड़े पहने, किससे दोस्ती करें और कितनों से संबंध रखें. हम पश्चिमी देशों का अनुकरण केवल खुलेपन के लिए करते हैं. नियमों को मानने के लिए नहीं करते. निश्चित रूप से आज सामाजिक परिवर्तन की जरूरत है, लेकिन यह परिवर्तन उन प्रथाओं में करना चाहिए, जो महिलाओं को पीछे धकेल रही हैं, उन्हें शिक्षित होने से रोक रही हैं. उनका कम उम्र में विवाह करवा रही हैं.

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