गंभीर पहल के साथ धैर्य भी जरूरी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Apr 2015 3:06 AM (IST)
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स्थानीयता नीति को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर सरकार ने सर्वदलीय बैठक की तथा उसके बाद झारखंड के बुद्धिजीवियों के साथ विचार-विमर्श कर एक सकारात्मक वातावरण बनाने की कोशिश दिखायी है. सर्वमान्य राय तक पहुंचने के मकसद से सरकार की सर्व-सहमति की यह पहल उम्मीद जगानेवाली है. उसने यहां तक पहुंचने के लिए सालों का समय नहीं […]
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स्थानीयता नीति को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर सरकार ने सर्वदलीय बैठक की तथा उसके बाद झारखंड के बुद्धिजीवियों के साथ विचार-विमर्श कर एक सकारात्मक वातावरण बनाने की कोशिश दिखायी है. सर्वमान्य राय तक पहुंचने के मकसद से सरकार की सर्व-सहमति की यह पहल उम्मीद जगानेवाली है.
उसने यहां तक पहुंचने के लिए सालों का समय नहीं लिया. पक्ष-विपक्ष के आग्रह-दुराग्रह से हट कर इस सरकार ने पिछली सरकार के मसौदे को नीति की प्रस्तावना मान कर बहुत स्वस्थ मानसिकता का परिचय दिया.
यह विडंबना ही है कि जिस हेमंत सरकार के प्रारूप को रघुवर सरकार ने अपनी स्थापना के रूप में लिया है, उन्हीं हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोरचा उस मसौदे को मानने को तैयार नहीं. झामुमो के स्टीफन मरांडी तथा विनोद पांडेय हेमंत सरकार के मसौदे को खारिज करते हुए स्पष्ट कहते हैं कि वह सरकार का फैसला था, पार्टी का उससे कोई सरोकार नहीं. इसी तरह सभी पार्टियों की अपनी-अपनी राय है.
बुद्धिजीवियों के भी अपने-अपने रुख हैं. दरअसल, किसी पार्टी विशेष का मानना क्या है, इससे सरकार का फैसला प्रभावित होना जरूरी नहीं. लेकिन यह भी जरूरी है कि इन्हीं मत-विभिन्नताओं के बीच से उसे रास्ता निकालना है. इसके लिए सरकार की मौलिक दृष्टि और स्वतंत्र राय का होना जरूरी है. इस सरकार के प्रयास ने यह विश्वास जगाया है. यह अलग बात है कि माकपा ने उस पर होमवर्क नहीं करने का आरोप लगाया है. सरकार के रुख से यह नहीं लगता कि वह अब अनिर्णय की स्थिति में इस मसले को छोड़ देगी. स्थानीयता को लेकर सरकार की रचनात्मक पहल उसके गंभीर रुख को दर्शाती है.
यह ठीक है कि स्थानीयता का मसला सिर्फ सरकारी नौकरी और शिक्षा से जुड़ा नहीं है, यह झारखंड की अस्मिता को भी दूर-दूर तक प्रभावित करेगा. इसलिए हर हाल में अप्रैल महीने में ही स्थानीय नीति को लागू करने की अपनी प्रतिबद्धता पर इस सरकार को एक बार ठहर कर सोच लेना चाहिए. जिस नीति को तय करने में पंद्रह साल गुजर गये, उसे तय करने में कुछ और माह लग जायें, तो प्रलय नहीं हो जायेगा. स्वस्थ और सकारात्मक मकसद से किया गया मनन-मंथन कुछ सार्थक ही देगा.
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