संस्थाओं का कायाकल्प है जरूरी

Published at :08 Apr 2015 4:00 AM (IST)
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संस्थाओं का कायाकल्प है जरूरी

आर एस पांडेय पूर्व केंद्रीय सचिव ‘स्वधर्म’ पर आधारित रणनीति, देशी और कम खर्चीले समाधानों वाले हमारे लोगों की शक्ति और प्रतिभा, जैसा कि गौरवशाली प्राचीन काल में हुआ करता था, को वैश्विक तकनीकों और संसाधनों से जोड़ने (काफी हद तक भारत के मंगल ग्रह अभियान की तरह) की जरूरत है. बड़े या छोटे देशों- […]

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आर एस पांडेय

पूर्व केंद्रीय सचिव

‘स्वधर्म’ पर आधारित रणनीति, देशी और कम खर्चीले समाधानों वाले हमारे लोगों की शक्ति और प्रतिभा, जैसा कि गौरवशाली प्राचीन काल में हुआ करता था, को वैश्विक तकनीकों और संसाधनों से जोड़ने (काफी हद तक भारत के मंगल ग्रह अभियान की तरह) की जरूरत है. बड़े या छोटे देशों- उदाहरण के लिए चीन या सिंगापुर- ने सकल वैश्विक उत्पादन में अपनी हिस्सेदारी कम समय में ही बहुत बढ़ा ली है. इन्होंने अपने ‘स्वधर्म’ को अपना कर ही ये उपलब्धियां हासिल की हैं.

वर्ष 2014 में भाजपा का शानदार तरीके से सत्ता में आना आम राजनीति से अलग हट कर कुछ करने का जनादेश भी था. यह गौरवपूर्ण भविष्य की ओर भारत के त्वरित प्रयाण की जनाकांक्षा का परिचायक था, जो कुछ हद तक उसके गौरवपूर्ण अतीत की तरह हो. परंतु राष्ट्र के भाग्य में यह संक्रमण किस प्रकार घटित हो सकता है?

वर्ष 1700 में सकल वैश्विक घरेलू उत्पादन में भारत 22.6 फीसदी का योगदान करता था, लेकिन भारी गिरावट के बाद 1952 में यह मात्र 3.8 फीसदी रह गया. इसी तरह, 1750 में दुनिया के औद्योगिक उत्पादन में भारत का हिस्सा करीब 25 फीसदी था, जो 1900 में घट कर दो फीसदी रह गया था.

ज्यादातर टिप्पणीकार देश के भाग्य को बदलने के लिए विध्वंसक ब्रिटिश राज के शोषणकारी उद्देश्यों को जिम्मेवार मानते हैं. लेकिन, अगर मसला एक विदेशी सरकार के शोषण का ही होता, तो राजनीतिक स्वतंत्रता की करीब सात दशकों की अवधि में भारत के गौरव को अधिकाधिक या कम-से-कम समुचित स्तर तक वापस बहाल कर लिया जाना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ. पिछले ढाई दशकों में विकास में आयी तेजी के बावजूद सकल वैश्विक घरेलू उत्पादन में भारत का हिस्सा तीन फीसदी के आसपास ही बना हुआ हुआ है. औद्योगिक उत्पादन में तो यह हिस्सा 2.3 फीसदी ही है. सकल घरेलू उत्पादन के हिसाब से दुनिया में हम दसवें स्थान पर हैं, जो स्तर 1980 के दशक में भी था. यह राष्ट्रों के समूह में समृद्धि की सापेक्षता के आधार पर ‘स्टेशनरी रन’ का मामला है.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि पतन का कारण वास्तव में विदेशी शासन नहीं, बल्कि वे संस्थाएं थीं, जिन्हें देश के शोषण के लिए बनाया गया था. और सरकारों के बदल जाने के बाद भी अंगरेजों द्वारा बनायी गयीं प्रमुख संस्थाएं और संरचनाएं, जैसे- लोक सेवा, पुलिस, न्यायपालिका, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं विकास की पश्चिमी पद्धतियां जस की तस बनी रहीं. स्वतंत्रता प्राप्ति के करीब सात दशक बाद भी समाहरणालयों और सचिवालयों में योजनाएं बनाने और लागू करनेवाली व्यवस्थाओं की संरचनाओं में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ. इनमें सुविचारित बदलाव की आवश्यकता है, जिसमें लोक सेवा जैसे वरीयता और सुरक्षा आधारित व्यवस्थाओं में कामकाज के आधार पर प्रोत्साहन और पदोन्नति देने का प्रावधान होना चाहिए. दरअसल, 1970 के दशक में बहुत बड़ा नुकसान तब कर दिया गया, जब ‘समर्पित’ लोक सेवा का आह्वान किया गया. यह सुखद है कि हमारे नये प्रधानमंत्री ने नौकरशाही को अराजनीतिक रहने का सकारात्मक संदेश दिया है. परंतु, किये जानेवाले सुधारों में लोक सेवा और निजी क्षेत्र के अधिकारियों की आपस में आवाजाही की प्रक्रिया भी सम्मिलित की जानी चाहिए.

समान कानून और न्याय की विरोधात्मक व्यवस्था पर आधारित न्यायपालिका, जो कि अंगरेजों द्वारा स्थापित की गयी थी, भी आम तौर पर अपरिवर्तित रही है. हद तो यह है कि लंदन के ठंडे मौसम के अनुरूप पहनी जानेवाली काली पोशाक भारत के गर्म मौसम में भी पहनी जाती रही है. तीन आधारभूत कानून- भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य कानून- हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के केंद्र में बने हुए हैं.

हालांकि उतार-चढ़ावों से भरे हाल के दौर में न्यायपालिका विश्वास की पूंज बनी रही, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी भारी संख्या में मुकदमों का लंबित होना तथा गरीबों (जो आबादी का करीब आधा हिस्सा हैं) तक न्याय की संस्थाओं की प्रभावी पहुंच का अभाव है. भारत की विविध परिस्थितियों में तेजी से न्याय सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थागत न्यायिक सुधार बहुत आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था के विस्तार के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च वहन कर पाना स्पष्ट रूप से असंभव है.

एक अन्य क्षेत्र मानव संसाधन विकास है, जहां भारत-केंद्रित अनुकूल कार्यक्रमों को नहीं अपनाने के कारण ठहराव आ गया है. भारत में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं और यह दुनिया के सर्वाधिक जनसंख्या घनत्ववाले देशों में है. परिणामस्वरूप, प्रति व्यक्ति भूमि-आधारित संसाधनों के मामले में भारत पिछड़े देशों में शामिल है. यहां दुनिया की 17 फीसदी आबादी रहती है, लेकिन वैश्विक क्षेत्रफल का सिर्फ तीन फीसदी, कोयले का 10 फीसदी और तेल व गैस का मात्र 0.5 फीसदी ही भारत के हिस्से में है. और, इसीलिए, मानव संसाधन सभी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए. लेकिन, ‘सबके लिए शिक्षा’ आजादी के 67 वर्षो बाद भी दूर की कौड़ी बनी हुई है.

विशेषज्ञों की सिफारिश के मुताबिक, शिक्षा के मौजूदा पश्चिमी मॉडल के लिए सकल घरेलू उत्पादन के छह फीसदी निवेश की आवश्यकता है, जो स्पष्ट रूप से वहन करने की क्षमता से परे है. इसकी जगह, हमें ग्रामीण भारत की प्रचुर सामाजिक पूंजी का निवेश करने की आवश्यकता है, जो परस्पर घनिष्ठता से जुड़े समुदायों और सामाजिक संबंधों वाले हमारे गांवों की विशिष्टता है. ‘सामुदायीकरण’ या प्रयोक्ता समुदायों को सरकारी विद्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों की जिम्मेवारी देने के आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिले हैं.

मुख्य सचिव के कार्यकाल के दौरान नागालैंड में मेरे द्वारा संचालित परियोजना, जिसने संयुक्त राष्ट्र पब्लिक सर्विस अवॉर्ड जीता था, ने यह दिखाया है कि सेवा उपलब्ध करानेवाली निचले स्तर की संस्थाओं, जैसे- विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र आदि को यदि सरकारी संसाधनों के साथ सरकार से लोगों (जिनके बच्चे उन विद्यालयों में पढ़ने जाते हैं, जो सही मायने में स्टेकहोल्डर हैं, जो कि पंचायती राज व्यवस्था से भिन्न है) को सौंप दिया जाता है तथा सरकार अपनी भूमिका में बदलाव करते हुए सहयोग और निगरानी का उत्तरदायित्व संभालती है, तो खर्च और परिणाम में चमत्कारिक बदलाव सामने आते हैं.

नागालैंड कार्यक्रम के यूनिसेफ के आकलन ने शिक्षकों की उपस्थिति और बच्चों की उत्तीर्णता में करीब 100 फीसदी की बेहतरी को रेखांकित किया था. बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर शून्य हो गयी थी और बिजली के दाम की वसूली में 200 फीसदी से अधिक की बढ़त जैसे अन्य सकारात्मक परिणाम भी हासिल हुए.

संदेश स्पष्ट है. ‘स्वधर्म’ पर आधारित रणनीति, देशी और कम खर्चीले समाधानों वाले हमारे लोगों की शक्ति और प्रतिभा, जैसा कि गौरवशाली प्राचीन काल में हुआ करता था, को वैश्विक तकनीकों और संसाधनों से जोड़ने (काफी हद तक भारत के मंगल ग्रह अभियान की तरह) की जरूरत है. बड़े या छोटे देशों- उदाहरण के लिए चीन या सिंगापुर- ने सकल वैश्विक उत्पादन में अपनी हिस्सेदारी बहुत कम समय में ही बहुत बढ़ा ली है.

इन्होंने अपने ‘स्वधर्म’ को अपना कर ही ये उपलब्धियां हासिल की हैं. ‘अलग तरीके से’ काम करने के साथ जुड़ी वृद्धि की सोच में ‘अलग ढंग के’ काम करने की हिम्मत भी शामिल होनी चाहिए, जो कि ‘हमारी परिस्थितियों के अनुकूल’ हो. भारी जनादेश के साथ सत्ता में पहुंचे अति लोकप्रिय प्रधानमंत्री से उम्मीद जगी है और हमारे कदम सही दिशा में चल पड़े हैं.

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