उद्यमी से थोड़ी दूरी ही उचित है

Published at :07 Apr 2015 1:48 AM (IST)
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उद्यमी से थोड़ी दूरी ही उचित है

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री मोदी को उद्यमियों द्वारा चालित नहीं होना चाहिए. नीति बनाने में देश के सभी वर्गो की हिस्सेदारी को उचित महत्व देना चाहिए. उल्लेखनीय यह है कि गलत दिशा में तेज चलने की तुलना में सही दिशा में धीरे चलना ज्यादा सुखद होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयास है कि उद्यमियों को […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

मोदी को उद्यमियों द्वारा चालित नहीं होना चाहिए. नीति बनाने में देश के सभी वर्गो की हिस्सेदारी को उचित महत्व देना चाहिए. उल्लेखनीय यह है कि गलत दिशा में तेज चलने की तुलना में सही दिशा में धीरे चलना ज्यादा सुखद होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयास है कि उद्यमियों को साथ लेकर चलें, जैसे संयुक्त परिवार में कर्ता सबको साथ लेकर चलता है. प्रथम दृष्टया यह नीति अच्छी दिखती है. परंतु यदि परिवार का कर्ता परिवार के एक घटक के प्रति विशेष रूप से मेहरबान हो, तो आपसी कलह बढ़ती है और अंतत: परिवार टूट जाता है. कर्ता के लिए अनिवार्य होता है कि परिवार के विभिन्न व्यक्तियों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन बना कर चले. यह बात देश पर भी लागू होती है. प्रधानमंत्री यदि किसी वर्ग विशेष के नजदीक दिखें और दूसरों से दूरी रखें, तो समाज में असंतुलन पैदा होगा. प्रधानमंत्री के एकतरफा व्यवहार के कारण पूरा देश टूट जाये, यह स्वीकार्य नहीं. शायद इसीलिए भारतीय परंपरा में व्यक्ति विशेष के भरोसे देश को चलाने के स्थान पर समाज के विभिन्न घटकों के बीच संवाद को अधिक महत्व दिया गया था.

उद्यमियों के साथ संवाद करने में मोदी द्वारा जापान की पॉलिसी का अनुसरण किया जा रहा दिखता है. जापान की सरकार सबको साथ लेकर चलती है, जैसे हमारे संयुक्त परिवार में. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान की सफलता का श्रेय अकसर इस परंपरा को दिया जाता है. इस व्यवस्था के केंद्र में जापान की मिनिस्ट्री आफ इंटरनेशनल ट्रेड एंड इंडस्ट्री है, जिसे मिटी नाम से जाना जाता है. मिटी ने पचास के दशक में बैंकों को सलाह दी कि कपड़ा मिलों को लोन न दें. उसने कोयला और लौह खनिज के आयात को आसान बनाया. फलस्वरूप जापान का कपड़ा उद्योग बंद हो गया और स्टील उद्योग का विस्तार हुआ. इस प्रकार मिटी के प्रभाव में जापानी अर्थव्यवस्था का दिशा परिवर्तन हुआ. परंतु प्रश्न है कि यह दिशा परिवर्तन जापान के लिए लाभप्रद रहा कि नहीं?

कुछ विद्वानों के अनुसार, मिटी द्वारा बढ़ायी गयी पॉलिसी हानिप्रद रही. दो उदाहरण प्रस्तुत हैं. पहला, सत्तर के दशक में जापान का स्टील उद्योग ध्वस्त हो गया. तेल के दाम में वृद्धि से जापान के ये उद्योग संकट में आ गये. यदि मिटी ने उद्यमियों को स्टील में न धकेला होता, तो इस नुकसान से वह देश बच जाता. दूसरा, सोनी कंपनी ने मिटी से ट्रांजिस्टर के आयातों की अनुमति मांगी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया. परंतु सोनी ने मिटी के विरोध के बावजूद इनका आयात किया और इनके बल पर वह विशाल इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी बन गयी. इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जापान में मिटी का रिपोर्ट कार्ड संदिग्ध रहा है.

जापान की सफलता का मूल रहस्य ऊंची घरेलू बचत दर तथा अनुशासित श्रमिक हैं. जापान की संस्कृति में राजा तथा सरकार पर अटूट भरोसा किया जाता है. असल सफलता इन कारणों से थी. सरकार तथा उद्यमियों की नजदीकी एक अवरोध थी. इन्होंने आपसी मेलजोल से नीतियां निर्धारित की, जो अकसर गलत दिशा में थीं. जापान के मॉडल में दिशा परिवर्तन अतिशीघ्र हो जाता है, परंतु इसकी दिशा पर भरोसा नहीं रहता है. जापान की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था ट्राइसिकिल की तरह है. दिशा निर्धारित करने के लिए सरकार, उद्यमी तथा श्रमिक तीनों घटकों में घमासान मचा रहता है. तीनों के आपसी तनाव से दिशा तय होती है. ट्राइसिकिल के चलने में तीनों पहियों की सहमति जरूरी होती है, उसके बाद यह लंबे समय तक स्थिरता पूर्वक चलती रहती है.

जापानी मॉडल को अपनाना हमारे लिए घातक होगा. जापान की जनता एकसार है. वहां भाषा, जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के प्रपंच नहीं हैं. वह एक छोटा देश है, जहां राजा के प्रति अत्यधिक सम्मान है. देश को मनचाही दिशा में ले जाना और वापस लाना आसान है. भारत में अनेक प्रकार की विभिन्नताएं हैं. हमारी संस्कृति में विद्वान को श्रेष्ठ और राजा को उसके अधीन माना जाता है. इस देश को यदि जापान की तरह त्वरित परिवर्तन में डाला गया, तो तमाम लोग छूट जायेंगे और देश में असंतोष बढ़ेगा. मिटी का अनुभव बताता है कि नीति को शीघ्रतापूर्वक लागू करने की तुलना में नीति का सही दिशा-निर्धारण ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मोदी को विश्वास है कि उद्यमियों को साथ लेकर चलेंगे, तो आर्थिक विकास की गति बढ़ेगी और आम आदमी को भी सकून मिलेगा. आम आदमी का दीर्घकालिक हित उद्यमियों के माध्यम से ही हासिल होगा. इसलिए वे वर्तमान में आम आदमी की अनदेखी कर उद्यमी के साथ खड़े दिखते हैं.

इस पॉलिसी में तीन संकट है. पहला, आर्थिक विकास तीव्र होगा कि नहीं यह तय नहीं है. दूसरा, आर्थिक विकास तीव्र हो जाये, तो आम आदमी तक उसका लाभ रिसेगा या नहीं, यह तय नहीं है. तीसरा, आम आदमी को आर्थिक लाभ मिल जाये, तो भी वह संतुष्ट होगा या नहीं यह तय नहीं है. इन संकटों से बचना चाहिए. मोदी को उद्यमियों द्वारा चालित नहीं होना चाहिए. नीति बनाने में देश के सभी वर्गो की हिस्सेदारी को उचित महत्व देना चाहिए. उल्लेखनीय यह है कि गलत दिशा में तेज चलने की तुलना में सही दिशा में धीरे चलना ज्यादा सुखद होगा.

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