सपनीले आंदोलन और सपने तोड़नेवाली सत्ता

Published at :04 Apr 2015 5:18 AM (IST)
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सपनीले आंदोलन और सपने तोड़नेवाली सत्ता

पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हर राज्य का नेता सीएम बनते ही सत्ताधारी होकर जिस तरह अपने राज्य को संवारने निकलता है और आंदोलन के बिना पीएम बन कर जिस तरह प्रधानमंत्री सिर्फ बोलते हैं, उसमें नेतागिरी ज्यादा और जन सरोकार कम दिखते हैं. मैं पीएम नहीं, सेवक हूं. मैं सीएम नहीं, सेवक हूं. बीते […]

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पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
हर राज्य का नेता सीएम बनते ही सत्ताधारी होकर जिस तरह अपने राज्य को संवारने निकलता है और आंदोलन के बिना पीएम बन कर जिस तरह प्रधानमंत्री सिर्फ बोलते हैं, उसमें नेतागिरी ज्यादा और जन सरोकार कम दिखते हैं.
मैं पीएम नहीं, सेवक हूं. मैं सीएम नहीं, सेवक हूं. बीते दस महीने में कितनी बार प्रधानमंत्री और बीते एक महीने में कितनी बार केजरीवाल ने यह दोहराया होगा. अब तो यूपी की सड़कों पर चस्पा मंत्रियों के पोस्टर में भी सेवक लिखा जाता है. तो क्या वाकई राजनीति बदल गयी, या फिर सत्ता पाने के बाद हर नेता बदल जाता है?
यह सवाल देश में हर 15 बरस बाद आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन और उसके बाद आंदोलन की मौत से भी समझा जा सकता है और आंदोलन करते हुए सत्ता पाने के तरीके से भी. आजादी के बाद से किसी एक नीति पर देश सबसे लंबे वक्त तक चला, तो वह मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार तले देश को बाजार में बदलने का सपना है. 1991 से 2011 तक के दौर में देश के हर राजनीतिक दल ने सत्ता की मलाई चखी. हर धारा को आवारा पूंजी बेहतर लगी. जिसने कॉरपोरेट लूट को उभारा. विकास के नाम पर जमीन हथियाने का खुला खेल शुरू किया. देश की संपदा को मुनाफे की थ्योरी में बदला.
बहुसंख्य जनता हाशिये पर पहुंची और इसी दौर में देश में सबसे ज्यादा घपले-घोटाले हुए. सभी को जोड़ कर देखें, तो 90 लाख करोड़ की सीधे लूट हुई. खनिज संपदा की लूट पचास लाख करोड़ की अलग से हुई. आर्थिक सुधार की हवा से गुस्से में आये देश ने अन्ना आंदोलन को जन्म दिया, जिसे मोदी ने खूब भुनाया और केजरीवाल ने इसी आर्थिक सुधार तले हाशिये पर फेंके जा चुके लोगों से खुद को जोड़ा. संसदीय राजनीति के पन्नों को पलटें, तो सड़क पर आंदोलन कर ही वीपी सिंह सत्ता तक पहुंचे.
वीपी से ठीक 15 बरस पहले जेपी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ ही आंदोलन करते हुए संपूर्ण क्रांति का सपना दिया था.
लेकिन जेपी आंदोलन के बाद सारा संघर्ष सत्ता में ही सिमट गया. जेपी से 15 बरस पहले, समाजवादी सोच की धारा को संसद के भीतर संघर्ष के जरिये शुरुआत कर सड़क पर गैरकांग्रेस वाद का नारा लोहिया ने लगाया. तो 1967 में कई राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बन गयीं. शायद जनता ने हमेशा इसे महसूस किया इसीलिए तीन दशक तक अपनी मुट्ठी बंद कर रखी. 1984 से 2012 तक कभी किसी को बहुमत की ताकत नहीं दी. लेकिन जब दी तो क्या सीएम और क्या पीएम, हर को जनता ने बहुमत की ताकत दी. लेकिन सत्ता का मिजाज ही कुछ ऐसा निकला कि हर सत्ताधारी जनता को कुचलने में लग गया. कोई नया रास्ता किसी दौर में किसी के पास था नहीं.
इसलिए पीएम मोदी राउरकेला में छाती ठोंक कर अपनी उपलब्धि बताने के लिए मनमोहन की लकीर पहले खींचते हैं. जबकि सवाल खुद की उपलब्धि बताने का नहीं है, बल्कि वादों को पूरा कर जनता की मुश्किलों को खत्म करने का सवाल है. इसीलिए जनता को लगता है कि उसे हर दिन अप्रैल फूल बनाया जा रहा है.
मौजूदा दौर में बदलाव की राजनीति से खुश ना हों, क्योंकि जो पहले कभी नहीं हुआ वह इतिहास मोदी ने भी रचा और केजरीवाल ने भी. आजादी के बाद पहली बार जनता ने किसी गैरकांग्रेसी को इतनी ताकत के साथ पीएम बनाया कि वह जो चाहे सो नीतियां बना सकता है. और मोदी के सत्ता संभालने के महज नौ महीने के भीतर ही दिल्ली में केजरीवाल को इतनी सीटे मिल गयीं कि वह दिल्ली को जिस तरफ ले जाना चाहें ले जा सकते हैं. मोदी सरकार के वादों की फेरहिस्त की हवा दस महीने पूरे होते-होते निकलने लगी और केजरीवाल तो पहले महीने ही हांफते हुए नजर आये. तो क्या नेता सत्ता पाते ही जनता को अप्रैल फूल बना देता है? क्योंकि यह सवाल सिर्फ मोदी और केजरीवाल का नहीं है.
केजरीवाल की तर्ज पर बहुमत हासिल कर सत्ता संभाल रहे नेता कर क्या रहे हैं? सीएम की फेहरिस्त लंबी है. इसमें एक नाम असम के सीएम रहे प्रफुल्ल महंत का भी है. 33 बरस की उम्र में महंत तो सीधे कालेज हॉस्टल से सीएम हाउस पहुंचे थे. असम में खासे दिनों बाद किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिला था, तो महंत से उम्मीदें भी कुलांचे मार रही थीं. लेकिन अपने सबसे करीबी फूकन से ही महंत ने राजनीतिक तौर पर दो-दो हाथ वैसे ही किये, जैसा दिल्ली में केजरीवाल आंदोलन के साथी प्रशांत भूषण से कर रहे हैं.
पांच साल महंत की सरकार भी चली. आनेवाले पांच साल तक केजरीवाल की सरकार को भी कोई गिरा नहीं पायेगा. लेकिन भविष्य का रास्ता जाता किधर है, इसे लेकर महंत फंसे तो 1990 में चुनाव हार गये और 1996 में दोबारा सत्ता में लौटे, तो राजनीतिक तौर पर इतने सिकुड़ चुके थे कि दिल्ली से लेकर असम की सियासी चालों को ही चलने में वक्त गुजारते चले गये और आज सिवाय एक चुनावी क्षत्रप के उनकी कोई पहचान नहीं है.
तो क्या आनेवाले वक्त में केजरीवाल का भी रास्ता इसी दिशा में जायेगा? क्योंकि दिल्ली सीएम से ज्यादा पीएम के अधीन है. तो सवाल अब यही उभर रहा है कि क्या केजरीवाल भी पॉलिटिशियन हो गये, जैसे बाकी राज्यों में क्षत्रप बहुमत के बाद जनता से कटते हुए सिर्फ अपना जोड़-घटाव देखते हैं.
क्योंकि तीन बरस पहले यूपी की जनता ने पूर्ण बहुमत के साथ सीएम बना कर अखिलेश यादव को ताकत दी कि वह अपने तरीके से राज्य चलायें. लेकिन जब चलने लगा तो यूपी सांप्रदायिक हिंसा में उलझता नजर आया और सीएम सैफई में कला संस्कृति में खोये नजर आये. दो बरस पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जनता ने बहुमत के साथ वसुंधरा राजे, रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान को सीएम बनाया. वसुंधरा राजे किसानों को बिजली-पानी देने के वादे पर खरी नहीं उतर पायीं, तो वहीं मौसम की मार के बाद खुद को बेसहारा मान चुके 19 किसान मर गये. जयपुर के लिए मेट्रो सपना हो गया. वहीं छत्तीसगढ़ में नक्सली संकट के सामने रमन सरकार रेंगती दिखी.
छत्तीसगढ़ धान का कटोरा होकर भी किसान का कटोरा भर न सका. लगातार मध्य प्रदेश के वोटरों ने शिवराज को जिताया. हैट्रिक बनी. लेकिन युवा बेरोजगारों के सपने व्यापम घोटाले में चकनाचूर हो गये. नवीन पटनायक को भी ओड़िशा में जनता ने दो तिहाई बहुमत की ताकत दी. लेकिन ग्रामीण आदिवासियों की हालात में कोई परिवर्तन नहीं आया.
मनरेगा की लूट ने सरकार की कलई खोल दी. यानी जिस रास्ते मोदी को चलना है. जिस रास्ते केजरीवाल को चलना है, वह बहुमत मिलने के बाद नेता होकर हासिल करना मुश्किल है, क्योंकि हर राज्य का नेता सीएम बनते ही सत्ताधारी होकर जिस तरह अपने राज्य को संवारने निकलता है और आंदोलन के बिना पीएम बन कर जिस तरह प्रधानमंत्री सिर्फ बोलते हैं, उसमें नेतागिरी ज्यादा और जन सरोकार कम दिखते हैं. इसलिए देश हर बार आंदोलन से सपने जगाता है और सत्ता से सपने चूर-चूर होते देखता है.
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