अच्छी उपज के बाद भी मरने को मजबूर
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :27 Mar 2015 5:44 AM (IST)
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प्राकृतिक विपदा से तबाही तो लोगों के अनुभव में जमाने से है, लेकिन भरपूर फसल के बाद किसानों के जान देने की खबर आधुनिक विकास की कड़वी हकीकत है. पश्चिम बंगाल से ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण खबरें आ रही हैं. आलू की जोरदार पैदावार के बीच बीते कुछ दिनों में ही राज्य में 14 किसान अपनी […]
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प्राकृतिक विपदा से तबाही तो लोगों के अनुभव में जमाने से है, लेकिन भरपूर फसल के बाद किसानों के जान देने की खबर आधुनिक विकास की कड़वी हकीकत है. पश्चिम बंगाल से ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण खबरें आ रही हैं. आलू की जोरदार पैदावार के बीच बीते कुछ दिनों में ही राज्य में 14 किसान अपनी जान दे चुके हैं. उनकी मुश्किलें विपणन एवं भंडारण की आधारभूत संरचना के अभाव से जुड़ी जान पड़ती हैं.
राज्य में मौजूद कुल 435 कोल्डस्टोरेज में अधिकतम 62 लाख टन आलू रखा जा सकता है, जबकि वहां इस साल 1 करोड़ टन से अधिक आलू की पैदावार हुई है. ऐसे में किसानों को 50 किलो आलू की एक बोरी 140 रुपये में बेचनी पड़ रही है, जिससे उनकी लागत भी वसूल नहीं हो रही. जाहिर है, जिन किसानों ने कर्ज लेकर खेती की है, वे भारी दबाव में हैं.
राज्य सरकार भले इनकार करे, किंतु आशंका यही है कि कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहा है. इन इलाकों में बीते साल 50 किलो आलू की बोरी 300 से 350 रुपये में बिकी थी. तब बिहार, झारखंड, ओड़िशा जैसे पड़ोसी राज्यों में कीमतें चढ़ी हुई थीं, जिससे बंगाल से आलू की भारी मांग थी. वही कीमत मिलने की उम्मीद में इस साल आलू-उत्पादक यह नहीं देख सके कि कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए राज्य या केंद्र सरकार ने उन्हें कोई तंत्र मुहैया नहीं कराया है.
होना तो चाहिए था कि किसानों से उपज की एक निश्चित मात्र उचित मूल्य पर खरीदने की सरकार गारंटी देती. लागत मूल्य पर लाभ की गारंटी देना आम चुनाव में भाजपा का प्रमुख वादा भी था. साथ ही फसल का बीमा होता, संस्थागत ऋण तक उनकी पहुंच आसान होती और उत्पादन के पूवार्नुमान के आधार पर भंडारण तथा वितरण की व्यवस्था दुरुस्त रखी जाती. देश में आर्थिक उदारीकरण के ढाई दशक किसानों की कुल संख्या में कमी और खेती के घाटे का सौदा बनने के साल रहे हैं.
जीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर निर्भर 50 फीसदी से ज्यादा आबादी इसी कारण गरीबी और शोषण के दुष्चक्र से नहीं उबर पायी है. जाहिर है, उदारीकृत अर्थव्यवस्था को छोटे और सीमांत किसानों की प्राथमिकताओं के साथ जब तक नहीं जोड़ा जायेगा, किसान कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बीच आत्महत्या के लिए अभिशप्त होते रहेंगे.
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