बड़ा घाटा संतों के प्रति विश्वास का

Published at :23 Aug 2013 4:12 AM (IST)
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बड़ा घाटा संतों के प्रति विश्वास का

।।आसाराम पर आरोप।।सार्वजनिक जीवन साख पर निर्भर है और साख बनती है छवि से. छवि इस बात से तय होती है कि आपके बारे में कैसी सूचनाएं विशाल जनसमूह तक पहुंचती हैं. मीडियामुखी और सूचना-शासित मौजूदा समय में यह बात पहले से कहीं ज्यादा सच है. खिलाड़ी-व्यापारी, नेता-अभिनेता, संत और आंदोलनकारी यानी हर वह व्यक्ति […]

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।।आसाराम पर आरोप।।
सार्वजनिक जीवन साख पर निर्भर है और साख बनती है छवि से. छवि इस बात से तय होती है कि आपके बारे में कैसी सूचनाएं विशाल जनसमूह तक पहुंचती हैं. मीडियामुखी और सूचना-शासित मौजूदा समय में यह बात पहले से कहीं ज्यादा सच है. खिलाड़ी-व्यापारी, नेता-अभिनेता, संत और आंदोलनकारी यानी हर वह व्यक्ति जिसका काम जनसमूह का हृदय जीते बगैर नहीं चल सकता, इसी कारण खास ख्याल रखता है कि लोगों के बीच उसकी छवि हमेशा उज्ज्वल रहे.

इसका एक तरीका तो यही है कि सार्वजनिक जीवन के जिस क्षेत्र में आपको महारत है, आप अपनी चिंता का दायरा उसी तक रखें. चिंता का दायरा सीमित रखने से लोकप्रियता का दायरा सीमित भले होता हो, आदमी वक्त-बेवक्त के विवाद से बच जाता है. बहरहाल, खिलाड़ी, व्यापारी और अभिनेता तो इस नियम को मान कर चल सकते हैं, लेकिन राजनेता और संत नहीं. कारण कि इनका काम सार्वजनिक जीवन के हर पक्ष के भले-बुरे से लोगों को अवगत कराना होता है.

राजनेता और संत एक तरह से सार्वजनिक नैतिकता को परिभाषित करनेवाले व्यक्तित्व होते हैं. इसलिए उन्हें अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है. इस कोण से देखें तो संत आसाराम का हालिया व्यवहार असावधानी भरा लगेगा. इस साल जनवरी में पूरी दिल्ली गैंग रेप का शिकार एक लड़की को न्याय दिलाने के लिए आंदोलित थी. ऐसे वक्त में आसाराम का यह बयान खूब उछला कि लड़की हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाती तो लड़के दुष्कर्म नहीं करते. असावधानी से भरे उनके ऐसे बयान और भी हैं. एक बार छवि विवादास्पद हो जाये, तो उसे सुधार पाना मुश्किल होता है, संत के लिए तो और भी, क्योंकि सार्वजनिक जीवन संभवत: संत से ही सबसे कठोर नैतिक आचरण की अपेक्षा रखता है.

संत आसाराम फिलहाल छवि के ऐसे ही संकट से जूझ रहे हैं. उनकी छवि को धूमिल करता एक नया प्रकरण सामने आया है. एक किशोरी ने उन पर दुष्कर्म का आरोप मढ़ा है. दुष्कर्म पीड़िता को न्याय दिलानेवाले कानूनों को हाल में कठोर बनाया गया है. इसलिए अगर जांच चली तो संत आसाराम को ही साबित करना होगा कि वे दोषी नहीं है. अब जांच चाहे जितनी लंबी चले, और फैसला चाहे जितनी देर से आये, पर आसाराम की संत छवि को अभी जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई शायद ही हो पाये. संत की धूमिल होती छवि से उनके भक्तों को ठेस तो लगी ही है, बड़ा घाटा उस विश्वास का हुआ है जिसके सहारे कोई जग-जीवन की अपनी निराशा को संत के चरणों में अर्पित कर फिर से नवजीवन के सपने संजोता है.

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