बासित की शह और वीके सिंह की मात
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :26 Mar 2015 2:37 AM (IST)
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पुष्परंजन दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज यासीन मलिक जैसे नेता को भारतीय करदाताओं के पैसे से हर सुविधा दी जाती है, बदले में वह बयान देता है कि मैं भारतीय नहीं हूं. ऐसे देशद्रोही की बातों को सुन कर किसी भी देशवासी का खून खौल सकता है, लेकिन विदेश राज्य मंत्री सिर्फ ‘डिस्गस्टेड’ होते हैं! नयी […]
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पुष्परंजन
दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज
यासीन मलिक जैसे नेता को भारतीय करदाताओं के पैसे से हर सुविधा दी जाती है, बदले में वह बयान देता है कि मैं भारतीय नहीं हूं. ऐसे देशद्रोही की बातों को सुन कर किसी भी देशवासी का खून खौल सकता है, लेकिन विदेश राज्य मंत्री सिर्फ ‘डिस्गस्टेड’ होते हैं!
नयी दिल्ली में नियुक्त पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित आज की तारीख में सबसे सफल कूटनीतिक हैं. पाकिस्तान में बासित की जय-जयकार हो रही है. बासित का ‘मिशन कश्मीर’ बहुत हद तक सफल हो रहा है. बासित ने साबित किया है कि हुर्रियत नेताओं से बातचीत में भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान को आपत्ति नहीं है. दूसरा, कश्मीर समस्या के समाधान के लिए ‘थर्ड पार्टी’ यानी हुर्रियत को वार्ता की मेज पर लाना होगा.
सऊदी अरब न सिर्फ पाकिस्तान का मित्र देश है, बल्कि उसे पाकिस्तानियों का ‘सेकेंड होम’ माना जाता है. दुनिया के मु़ख्तलिफ हिस्सों में 70 लाख पाकिस्तानी रहते हैं, जिनमें सर्वाधिक 25 लाख सऊदी अरब में हैं. 23 मार्च को सऊदी अरब के रियाद और जेद्दा स्थित दूतावासों में ‘पाकिस्तान दिवस’ मना, पर उन समारोहों में किसी सऊदी मंत्री ने शिरकत नहीं की. चीन को पाकिस्तान का ‘ऑल वेदर फ्रेंड’ माना जाता है.
पेइचिंग स्थित पाक दूतावास और शांघाई, चेंगदू, क्वांगचोऊ, हांगकांग के कौसिलावासों में मनाये गये पाक दिवस समारोहों में एक भी चीनी मंत्री की उपस्थिति नहीं थी. अमेरिका से लेकर यूरोप, नार्डिक, एशिया-प्रशांत (भारत को छोड़ कर) और अफ्रीकी देशों में स्थित पाक दूतावासों में मनाये गये इस समारोह में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिला, जहां संबंधित देश का कोई मंत्री बतौर अतिथि गया हो. फिर भारत सरकार ने क्या सोच कर अपने विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह को पाक उच्चायोग भेजा, देश इस बारे में जरूर जानना चाहेगा.
जनरल वीके सिंह का ट्वीट पढ़िये, तो वे ‘डिस्गस्टेड’ (खीङो हुए) हैं. खीझ की वजह सरकार में बैठे उनसे बड़े लोग हैं, जिन्होंने जनरल साहब को पाक उच्चायोग में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया था. ऐसे फैसले या तो ‘पीएमओ’ करता है, या फिर विदेश मंत्री; जनरल सिंह ने यह कह कर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
हमारे विदेश राज्य मंत्री ने जो कुछ किया, उसके मुकाबले नयी दिल्ली स्थित पाक उच्चायोग में आये जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अलगाववादी नेता यासीन मलिक का अपराध कम नजर आता है, जिसने कैमरे के समक्ष कहा कि ‘आई एम नॉट इंडियन’! श्रीनगर में इसी अवसर पर हुर्रियत से जुड़ी, दुख्तराने मिल्लत की नेता सैयद आसिया अंदराबी जब पाकिस्तानी झंडे (परचम-ए-सितारा-ओ-हिलाल) के तले कौमी तराना (पाक राष्ट्रगीत) गा रही थी, तो उसका अपराध भी जनरल वीके सिंह जैसे जिम्मेवार विदेश राज्य मंत्री के आगे कम नजर आ रहा था. आसिया और यासीन, दोनों अपना ‘देशद्रोह धर्म’ निभा रहे थे. लेकिन, मोदी सरकार के एक मंत्री का राष्ट्रधर्म क्या कहता था?
यासीन मलिक हों, या आसिया अंदराबी, ये लोग सऊदी अरब, या चीन में यही कर्म करते, तो उन्हें शरिया और चीनी कानून के तहत पत्थरों से मारने, या गोली से उड़ा दिये जाने का हुक्म दिया जा चुका होता. इस तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार से एक आम हिंदुस्तानी यह उम्मीद करता है कि यासीन और आसिया जैसे देशद्रोहियों के पासपोर्ट जब्त कर उन्हें सीमा पार पाकिस्तान पटक दिया जाये. मगर, इतनी मामूली कार्रवाई के आसार भी नहीं दिखते. यह मसरत आलम की रिहाई के समय समझ में आ गया था. तो क्या मोदी सरकार के पास रीढ़ नहीं है?
यह ‘बिना रीढ़ की सरकार’ का ही नतीजा है कि यासीन मलिक जैसा नेता नयी दिल्ली आता है, तो उसे भारतीय पुलिस की सुरक्षा दी जाती है. भारतीय करदाताओं के पैसे से मलिक को ऐशो-आराम व हर सुविधाएं दी जाती है, बदले में वह बयान देता है कि मैं भारतीय नहीं हूं. यासीन मलिक जैसे देशद्रोही की बातों को सुन कर किसी भी देशवासी का खून खौल सकता है, लेकिन हमारे विदेश राज्य मंत्री, जो सेना प्रमुख रह चुके हैं, सिर्फ ‘डिस्गस्टेड’ होते हैं. कमाल का राष्ट्रवाद है!
विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह को मालूम था कि हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी, मीर वाइज उमर फारूक भी पाक उच्चायोग में आमंत्रित हैं. इस पूरे प्रकरण को देख क र लगता है कि विदेश राज्य मंत्री को अपने पद की गरिमा का पता नहीं है, या फिर विदेश नीति तय करनेवाले अभी बालिग नहीं हुए हैं. दक्षेस के नाम पर हमारे विदेश सचिव का इसलामाबाद जाना एक ऐसा ही अपरिपक्व निर्णय था. उससे पहले हमारे किसी विदेश सचिव ने क्या सार्क के लिए ऐसी यात्रा की है? भारत इस समय सार्क का अध्यक्ष देश नहीं हैं, तो इसलामाबाद में अगले दक्षेस सम्मेलन की चिंता नयी दिल्ली को क्यों हो रही है?
और दक्षेस की आड़ में भारत-पाक वार्ता की पहल करना किस चार्टर में लिखा गया है? भारतीय विदेश सचिव की पाकिस्तान यात्रा कूटनीतिक समुदाय के बीच प्रहसन बन कर रह गया. जिन हुर्रियत नेताओं के पाक उच्चायुक्त से मिलने की वजह से आप भारत-पाक वार्ता निरस्त करते हैं, उसी पाक उच्चायोग में 23 मार्च को इतिहास दोहराया जाता है, और उस कालखंड का सबसे शर्मनाक हिस्सा आपके विदेश राज्य मंत्री की उपस्थिति है!
पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित का अगला कदम नयी दिल्ली में कश्मीर दिवस मनाना भी हो सकता है. किन वजहों से अब्दुल बासित को नयी दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त पद के लिए सबसे योग्य कूटनीतिक समझा गया, यदि इस पर समय से पहले गौर कर लिया जाता तो शायद नवाज शरीफ की बिछायी बिसात को समझने में आसानी होती. अब्दुल बासित 3 मार्च, 2014 को नयी दिल्ली पदभार के लिए पहुंचे थे.
दिल्ली आने से पूर्व बासित बर्लिन में पाकिस्तान के राजदूत थे, और यहां आने के ठीक 27 दिन पहले, 5 फरवरी 2014 को उन्होंने बर्लिन में ‘कश्मीर सॉलिडरिटी डे’ मनाया था, जिसमें पृथकतावाद को पसंद करनेवाले लोगों ने शिरकत की थी.
अब्दुल बासित पाकिस्तान के विदेश सचिव बनाये जाने की लिस्ट में थे, लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रलय ने बासित के ‘कश्मीर प्रेम’ को देखते हुए उन्हें नयी दिल्ली भेजना बेहतर समझा. ‘एम्बेसडर बासित’ मास्को, न्यूयार्क, सना, जेनेवा और लंदन में पाकिस्तान का दूत रहते हुए भारत स्थित कश्मीरियों के मानवाधिकार की आवाज लगातार उठाते रहे हैं.
बासित अभी और जहर घोलें, कश्मीर में माहौल को बदतर और विषाक्त कर दें, उससे पहले सरकार को उन्हें यहां से चलता कर देना चाहिए. उच्चायुक्त बासित, हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी और जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक से मिलना जायज समझते हैं. उन्हें तीसरा पक्ष जरूरी लगता है. इस तरह वे 1972 में हुए शिमला समझौते का लगातार उल्लंधन कर रहे हैं, जिसमें सिर्फ दो पक्ष, भारत और पाकिस्तान, को बातचीत की मेज पर मिलने की स्वीकृति दी गयी थी!
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