धर्मातरण की तरह जाति-अंतरण भी हो

Published at :30 Dec 2014 5:03 AM (IST)
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धर्मातरण की तरह जाति-अंतरण भी हो

पंडितजी ने मंत्रोच्चारण कर हवन किया. फिर सफेद टोपी पहने मजनूं मियां के सिर पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कीं.. और हो गया ‘धर्मातरण’. मजनूं मियां, मनोज बाबू बन गये. उनकी ‘घर वापसी’ हो गयी. इधर उनका धर्मातरण हुआ, उधर उनकी टीआरपी, घर की छत फाड़ कर ऊपर बढ़ गयी. तुरंत टीवी चैनलों के कैमराधारी […]

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पंडितजी ने मंत्रोच्चारण कर हवन किया. फिर सफेद टोपी पहने मजनूं मियां के सिर पर पानी की कुछ बूंदें छिड़कीं.. और हो गया ‘धर्मातरण’. मजनूं मियां, मनोज बाबू बन गये. उनकी ‘घर वापसी’ हो गयी. इधर उनका धर्मातरण हुआ, उधर उनकी टीआरपी, घर की छत फाड़ कर ऊपर बढ़ गयी. तुरंत टीवी चैनलों के कैमराधारी और अखबारों के ‘कलम के सिपाही’ उनके अंगरक्षक बन गये. मनोज बाबू का टीवी पर दिखने का और अखबार में छपने का, बचपन का सपना पूरा हुआ. यह सपना शायद मजनूं मियां रहते पूरा नहीं होता. हालांकि भारत में धर्म बदलने की आजादी है, फिर भी मीडिया ने इस मुद्दे को खूब उछाला.

इस पर खूब ‘प्राइम टाइम शो’ किये. इस वजह से आम लोगों में भी यह चर्चा का विषय बन गया है. अब इस कड़कड़ाती ठंड में लोग ‘सर्दी-खासी’ की नहीं, बल्कि ‘घर वापसी’ और धर्मातरण की चर्चा कर रहे हैं. युवाओं से लेकर सभाओं तक, और ट्वीटर से लेकर फेसबुक तक, यह आज बहस का विषय है. कोई पक्षधर है, तो कोई विरोधी. सोशल साइटों के कुछ यूजरों ने इसका मजाक भी उड़ाया कि यह सिर्फ सियासी साजिश है, जो धर्म की ‘गंदी राजनीति’ की देन है. इससे आम लोगों को कोई सरोकार नहीं. इसी विषय पर चंदू चायवाले के पास बेवजह बहस हो रही थी. अक्सर जब बहसें बेवजह होती हैं, तो उसके असर ‘ठहाकों’ के रूप सुनायी देने लगते हैं. आसपास के लोग भी ठहाको का हिस्सा बनकर अपना तनाव दूर करते हैं. बहस के दौरान किसी ने सुझाव दिया कि धर्मातरण है, तो ‘जाति-अंतरण’ भी होना चाहिए.

यानी कि जाति बदलने की सुविधा. ताकि पिछड़ी जाति के वो लोग, जिनके मन में ऊंची जाति का न होने का मलाल है या जिन्हें लगता है कि ऊंची जाति के नहीं होने के कारण समाज उनके साथ भेदभाव करता है, वे आसानी से अपनी जाति बदल कर ऊंची जाति में आ जाते. इसी तरह अगर ऊंची जाति वालों को लगता कि उनके बच्चों को 80-90 फीसदी अंक लाने के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं मिलती है और पिछड़ी जाति के बच्चे महज 50-55 फीसदी लाकर नौकरी पा लेते हैं, तो जाति-अंतरण के द्वारा ऊंची जाति के लोग आसानी से दूसरी जाति में चले जाते.

आज कुछ लोग मान रहे हैं कि धर्मातरण या ‘घर वापसी’ कराने से पूरे देश में एक धर्म के लोग हो जायेंगे. तो अगर जाति-अंतरण की सुविधा मिले, तो यकीन मानिए देश में एक नयी ‘राष्ट्रीय जाति’ आयेगी, जिसे आरक्षण की जरूरत नहीं होगी. जिससे जातिवाद स्वत: खत्म होगा. लेकिन ऐसा नहीं होगा. क्योंकि इससे जाति-धर्म के नाम पर राजनीति करनेवालों गंदे राजनीतिज्ञों का बड़ा नुकसान होगा. उनका वोट बैंक तो खत्म होगा ही, साथ-साथ बैंक बैलेंस भी खत्म हो जायेगा.

पंकज कुमार पाठक

प्रभात खबर, रांची

pankaj.pathak@prabhatkhabar.in

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